Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (English transliteration).

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yogIndudevavirachita
[ adhikAr-2 dohA-202
अन्यदपि बन्धुरपि त्रिभुवनस्य शाश्वतसौख्यस्वभावः
तत्रैव सकलमपि कालं जीव निवसति लब्धस्वभावः ।।२०२।।
अण्णु वि इत्यादि अण्णु वि अन्यदपि पुनरपि स पूर्वोक्त : सिद्धः कथंभूतः बंध
वि बन्धुरेव कस्य तिहुयणहं त्रिभुवनस्थभव्यजनस्य पुनरपि किं विशिष्टः सासय-सुक्ख-
सहाउ रागादिरहिताव्याबाधशाश्वतसुखस्वभावः एवंगुणविशिष्टः सन् किं करोति स भगवान्
तित्थजि तत्रैव मोक्षपदे णिवसइ निवसति कथंभूतः सन् लद्ध-सहाउ लब्धशुद्धात्मस्वभावः
कियत्कालं निवसति सयलु वि कालु समस्तमप्यनन्तानन्तकालपर्यन्तंिजय हे जीव इति
अत्रानेन समस्तकालग्रहणेन विमुक्तं भवति ये केचन वदन्ति मुक्तानां पुनरपि संसारे पतनं
भवति तन्मतं निरस्तमिति भावार्थः ।।२०२।।
अथ
गाथा२०२
अन्वयार्थ :[अन्यदपि ] फि र वे सिद्धभगवान् [त्रिभुवनस्य ] तीन लोकके
प्राणियोंका [बंधुरपि ] हित करनेवाले हैं, [शाश्वतसुखस्वभावः ] और जिनका स्वभाव
अविनाशी सुख है, और [तत्रैव ] उसी शुद्ध क्षेत्रमें [लब्धस्वभावः ] निजस्वभावको पाकर
[जीव ] हे जीव, [सकलमपि कालं ] सदा काल [निवसति ] निवास करते हैं, फि र चतुर्गतिमें
नहीं आवेंगे
भावार्थ :सिद्धपरमेष्ठी तीनलोकके नाथ हैं, और जिनका भव्यजीव ध्यान करके
भवसागरसे पार होते हैं, इसलिये भव्योंके बंधु हैं, हितकारी हैं जिनका रागादि रहित अव्याबाध
अविनाशी सुख स्वभाव है ऐसे अनन्त गुणरूप वे भगवान् उस मोक्ष पदमें सदा काल विराजते
हैं जिन्होंने शुद्ध आत्मस्वभाव पा लिया है अनन्तकाल बीत गये, और अनन्तकाल आवेंगे,
परंतु वे प्रभु सदाकाल सिद्धक्षेत्रमें बस रहे हैं समस्त काल रहते हैं, इसके कहनेका प्रयोजन
यह है, कि जो कोई ऐसा कहते हैं, कि मुक्तजीवोंका भी संसारमें पतन होता है, सो उनका
कहना खंडित किया गया ।।२०२।।
bhAvArthavaLI te pUrvokta siddha bhagavAn traN lokamAn rahelA bhavya janane bandhu ja
chhe. rAgAdi rahit avyAbAdh shAshvat sukhasvabhAv jeno chhe evA guNavishiShTa te bhagavAn shuddha
AtmasvabhAvane pAmIne mokShapadamAn samasta kAL sudhI-anantAnant kAL sudhI vase chhe.
ahIn ‘samasta kAL vimukta rahe chhe’ e kathanathI je koI kahe chhe ke mukta jIvonun
pharIthI sansAramAn patan thAy chhe’ tenA matanun khanDan karyun chhe, evo bhAvArtha chhe. 202.