adhikAr-2 dohA-203 ]paramAtmaprakAsha [ 537
३३४) जम्मण-मरण-विवज्जियउ चउ-गइ-दुक्ख विमुक्कु ।
केवल-दंसण-णाणमउ णंदइ तित्थु जि मुक्कु ।।२०३।।
जन्ममरणविवर्जितः चतुर्गतिदुःखविमुक्त : ।
केवलदर्शनज्ञानमयः नन्दति तत्रैव मुक्त : ।।२०३।।
पुनरपि कथंभूतः स भगवान् । जम्मण-मरण-विवज्जियउ जन्ममरणविवर्जितः । पुनरपि
किंविशिष्टः । चउ-गइ-दुक्ख विमुक्कु सहजशुद्धपरमानन्दैकस्वभावं यदात्मसुखं तस्माद्विपरीतं
यच्चतुर्गतिदुःखं तेन विमुक्तो रहितः । पुनरपि किंस्वरूपः । केवल-दंसण-णाणमउ क्रमकरणव्यवधान-
रहितत्वेन जगत्रयकालत्रयवर्तिपदार्थानां प्रकाशककेवलदर्शनज्ञानाभ्यां निर्वृत्तः केवलदर्शनज्ञानमयः ।
एवंगुणविशिष्टः सन् किं करोति । णंदइ स्वकीयस्वाभाविकानन्तज्ञानादिगुणैः सह नन्दति वृद्धिं
आगे फि र भी सिद्धोंका ही वर्णन करते हैं —
गाथा – २०३
अन्वयार्थ : — [जन्ममरणविवर्जितः ] वे भगवान् सिद्धपरमेष्ठी जन्म और मरणकर
रहित हैं, [चतुर्गतिदुःखविमुक्तः ] चारों गतियोंके दुःखोंसे रहित हैं, [केवलदर्शनज्ञानमयः ]
और केवलदर्शन केवलज्ञानमयी हैं, ऐसे [मुक्तः ] कर्म रहित हुए [तत्रैव ] अनंतकाल तक
उसी सिद्धक्षेत्रमें [नंदति ] अपने स्वभावमें आनंदरूप विराजते हैं ।
भावार्थ : — सहज शुद्ध परमानंद एक अखंड स्वभावरूप जो आत्मसुख उससे विपरीत
जो चतुर्गतिके दुःख उनसे रहित हैं, जन्म – मरणरूपरोगोंसे रहित हैं, अविनश्वरपुरमें सदा काल
रहते हैं । जिनका ज्ञान संसारी जीवोंकी तरह विचाररूप नहीं है, कि किसीको पहले जानें,
किसीको पीछे जानें, उनका केवलज्ञान और केवलदर्शन एक ही समयमें सब द्रव्य, सब क्षेत्र,
सब काल, और सब भावोंको जानता है । लोकालोक प्रकाशी आत्मा निज भाव अनंतज्ञान,
have, pharI siddhonun ja varNan kare chhe —
bhAvArtha — vaLI te siddha bhagavAn kevA chhe? te siddhabhagavAn janma-maraNathI rahit
chhe, sahaj shuddha paramAnand ja jeno ek svabhAv chhe evun je Atmasukh tenAthI viparIt je chAr
gatinAn dukh tenAthI rahit chhe, kevaLadarshanagnAnamay chhe, kramakaraNavyavadhAnarahitapaNe traN jagatanA
traNakALavartI padArthonA prakAshak kevaLadarshan ane kevaLagnAnathI rachAyel chhe. AvA guNavALA siddha
bhagavAn shun kare chhe? AvA guNavishiShTa siddha bhagavAn gnAnAvaraNAdi ATh karmathI rahit ane