Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (English transliteration). Gatha: 207 (Adhikar 2) Paramatmaprakash Mate Yogya Purush.

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yogIndudevavirachita
[ adhikAr-2 dohA-207
३३८) जे भवदुक्खहँ बीहिया पउ इच्छहिँ णिव्वाणु
इह परमप्प-पयासयहँ ते पर जोग्ग वियाणु ।।२०७।।
ये भवदुःखेभ्यः भीताः पदं इच्छन्ति निर्वाणम्
इह परमात्मप्रकाशकस्य ते परं योग्या विजानीहि ।।२०७।।
ते पर त एव जोग्ग वियाणु योग्या भवन्तीति विजानीहि कस्य इह परमप्प-पयासयह
व्यवहारेणास्य परमात्मप्रकाशाभिधानग्रन्थस्य, परमार्थेन तु परमात्मप्रकाशशब्दवाच्यस्य निर्दोषि-
परमात्मनः
ते के जे बीहिया ये भीताः केषाम् भव-दुक्खहं रागादिविकल्परहितपरमाह्लाद-
रूपशुद्धात्मभावनोत्थपारमार्थिकसुखविलक्षणानां नारकादिभवदुःखानाम् पुनरपि किं कुर्वन्ति जे
इच्छहिं ये इच्छन्ति किम् पउ पदं स्थानम् णिव्वाणु निर्वृतिगतपरमात्माधारभूतं
निर्वाणशब्दवाच्यं मुक्ति स्थानमित्यभिप्रायः ।।२०७।।
गाथा२०७
अन्वयार्थ :[ते परं ] वे ही महापुरुष [अस्य परमात्मप्रकाशकस्य ] इस
परमात्मप्रकाश ग्रंथके अभ्यास करनेके [योग्याः विजानीहि ] योग्य जानो, [ये ] जो
[भवदुःखेभ्यः ] चतुर्गतिरूप संसारके दुःखोंसे [भीताः ] डर गये हैं, और [निर्वाणम् पदं ]
मोक्षपदको [इच्छंति ] चाहते हैं
भावार्थ :व्यवहारनयकर परमात्मप्रकाशनामा ग्रंथकी और निश्चयनयकर निर्दोष
परमात्मतत्त्वकी भावनाके योग्य वे ही हैं, जो रागादि विकल्प रहित परम आनंदरूप
शुद्धात्मतत्त्वकी भावनासे उत्पन्न हुए अतीन्द्रिय अविनश्वर सुखसे विपरीत जो नरकादि संसारके
दुःख उनसे डर गये हैं, जिनको चतुर्गतिके भ्रमणका डर है, और जो सिद्धपरमेष्ठीके निवास
मोक्षपदको चाहते हैं
।।२०७।।
bhAvArthateo ja vyavahArathI A paramAtmaprakAsh nAmanA granthane ane paramArthathI
paramAtmaprakAsh shabdathI vAchya evA nirdoSh paramAtmAne yogya chhe, em jANoke jeo
rAgAdi vikalpothI rahit param AhlAdarUp shuddha AtmAnI bhAvanAthI utpanna pAramArthik
sukhathI vilakShaN nArakAdi bhavadukhothI bhayabhIt chhe ane jeo nirvRutigat (mokShaprApta)
paramAtmAnA AdhArabhUt ‘nirvAN’ shabdathI vAchya evA muktisthAnane ichchhe chhe, e abhiprAy
chhe. 207.