Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (English transliteration). Gatha: 208 (Adhikar 2).

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adhikAr-2 dohA-208 ]paramAtmaprakAsha [ 543
अथ
३३९) जे परमप्पहँ भत्तियर विसय ण जे वि रमंति
ते परमप्प-पयासयहँ मुणिवर जोग्ग हवंति ।।२०८।।
ये परमात्मनो भक्ति पराः विषयान् न येऽपि रमन्ते
ते परमात्मप्रकाशकस्य मुनिवरा योग्या भवन्ति ।।२०८।।
हवंति भवन्ति जोग्ग योग्याः के ते मुणिवर मुनिप्रधानाः के ते ते पूर्वोक्ताः
कस्य योग्या भवन्ति परमप्प-पयासयहं व्यवहारेण परमात्मप्रकाशसंज्ञग्रन्थस्य परमार्थेन तु
परमात्मप्रकाशशब्दवाच्यस्य शुद्धात्मस्वभावस्य कथंभूतो ये जे परमप्पहं भत्तियर ये परमात्मनो
भक्ति पराः पुनरपि किं कुर्वन्ति ये िवसय ण जे वि रमंति निर्विषयपरमात्मतत्त्वानुभूति-
समुत्पन्नातीन्द्रियपरमानन्दसुखरसास्वादतृप्ताः सन्तः सुलभान्मनोहरानपि विषयान्न रमन्त
इत्यभिप्रायः
।।२०८।।
आगे फि र भी उन्हीं पुरुषोंकी महिमा कहते हैं
गाथा२०८
अन्वयार्थ :[ये ] जो [परमात्मनः भक्तिपराः ] परमात्माकी भक्ति करनेवाले
[ये ] जो मुनि [विषयान् न अपि रमंते ] विषयकषायोंमें नहीं रमते हैं, [ते मुनिवराः ] वे
ही मुनीश्वर [परमात्मप्रकाशस्य योग्याः ] परमात्मप्रकाशके अभ्यासके योग्य [भवंति ] हैं
भावार्थ :व्यवहारनयकर परमात्मप्रकाश नामका ग्रंथ जो निश्चयनयकर
निजशुद्धात्मस्वरूप परमात्मा उसकी भक्तिमें जो तत्पर हैं, वे विषय रहित जो परमात्मतत्त्वकी
अनुभूति उससे उपार्जन किया जो अतीन्द्रिय परमानंदसुख उसके रसके आस्वादसे तृप्त हुए विषयोंमें
नहीं रमते हैं
जिनको मनोहर विषय आकर प्राप्त हुए हैं, तो भी वे उनमें नहीं रमते ।।२०८।।
vaLI, pharI te puruShono mahimA kahe chhe
bhAvArthate pUrvokta munivaro vyavahArathI paramAtmaprakAsh nAmanA granthane ane
paramAtmaprakAsh shabdathI vAchya shuddha AtmasvabhAvane yogya chheke jeo paramAtmAnI bhaktimAn
parAyaN hoy ane nirviShay paramAtmatattvanI anubhUtithI utpanna atIndriy paramAnandamay
sukharasanA AsvAdathI tRupta thaIne sulabh ane manohar evA viShayomAn paN ramatA na hoy,
e abhiprAy chhe. 208.