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yogIndudevavirachita
[ adhikAr-2 dohA-209
अथ —
३४०) णाण – वियक्खणु सुद्ध – मणु जो जणु एहउ कोइ ।
सो परमप्प – पयासयहँ जोग्गु भणंति जि जोइ ।।२०९।।
ज्ञानविचक्षणः शुद्धमना यो जन ईद्रशः कश्चिदपि ।
तं परमात्मप्रकाशकस्य योग्यं भणन्ति ये योगिनः ।।२०९।।
भणंति कथयन्ति जि जोइ ये परमयोगिनः । कं भणन्ति । जोग्गु योग्यम् । कस्य ।
परमप्प-पयासयहं व्यवहारनयेन परमात्मप्रकाशाभिधानशास्त्रस्य निश्चयेन तु परमात्मप्रकाश-
शब्दवाच्यस्य शुद्धात्मस्वरूपस्य । कं पुरुषं योग्यं भणन्ति । सो तम् । तं कम् । जो जणु
एहउ कोइ यो जनः इत्थंभूतः कश्चित् । कथंभूतः । णाण-वियक्खणु स्वसंवेदनज्ञान-
विचक्षणः । पुनरपि कथंभूतः । सुद्धमणुपरमात्मानुभूतिविलक्षणरागद्वेषमोहस्वरूपसमस्तविकल्प-
आगे फि र भी यही कथन करते हैं —
गाथा – २०९
अन्वयार्थ : — [यः जनः ] जो प्राणी [ज्ञानविचक्षणः ] स्वसंवेदनज्ञानकर विचक्षण
(बुद्धिमान) हैं, और [शुद्धमनाः ] जिसका मन परमात्माकी अनुभूतिसे विपरीत जो राग द्वेष
मोहरूप समस्त विकल्प – जाल उनके त्यागसे शुद्ध है, [कश्चिदपि ईदृशः ] ऐसा कोई भी
सत्पुरुष हो, [तं ] उसे [ये योगिनः ] जो योगीश्वर हैं, वे [परमात्मप्रकाशकस्य योग्यं ]
परमात्मप्रकाशके आराधने योग्य [भणंते ] कहते हैं ।
भावार्थ : — व्यवहारनयकर यह परमात्मप्रकाशनामा द्रव्यसूत्र और निश्चयनयकर
शुद्धात्मस्वभावसूत्रके आराधनेको वे ही पुरुष योग्य हैं, जो कि आत्मज्ञानके प्रभावसे महा प्रवीण
हैं, और जिनके मिथ्यात्व राग द्वेषादि मलकर रहित शुद्ध भाव हैं, ऐसे पुरुषोंके सिवाय दूसरा
कोई भी परमात्मप्रकाशके आराधने योग्य नहीं है ।।२०९।।
have, pharI paN e ja kathan kare chhe —
bhAvArtha — je yogIo chhe teo, svasamvedanagnAnamAn vichakShaN hoy ane paramAtmAnI
anubhUtithI vilakShaN evA rAgadveSh-mohasvarUp samastavikalpajALonA tyAgathI shuddha AtmA hoy
– Avo je koI jan hoy-tene vyavahAranayathI paramAtmaprakAsh nAmanA shAstrane ane nishchayanayathI
paramAtmaprakAsh shabdathI vAchya evA shuddhAtmasvarUpane yogya kahe chhe, e abhiprAy chhe. 209.