adhikAr-2 dohA-210 ]paramAtmaprakAsha [ 545
जालपरिहारेण शुद्धात्मा इत्यभिप्रायः ।।२०९।। एवं चतुर्विंशतिसूत्रप्रमितमहास्थलमध्ये
परमाराधकपुरुषलक्षणकथनरूपेण सूत्रत्रयेण षष्ठमन्तरस्थलं गतम् ।
अथ शास्त्रफलकथनमुख्यत्वेन सूत्रमेकं तदनन्तरमौद्धत्यपरिहारेण च सूत्रद्वयपर्यन्तं
व्याख्यानं करोति । तद्यथा —
३४१) लक्खण-छंद-विवज्जियउ एहु परमप्प-पयासु ।
कुणइ सुहावइँ भावियउ चउ-गइ-दुक्ख-विणासु ।।२१०।।
लक्षणछन्दोविवर्जितः एष परमात्मप्रकाशः ।
करोति सुभावेन भावितः चतुर्गतिदुःखविनाशम् ।।२१०।।
लक्खण इत्यादि । लक्खण-छंद-विवज्जियउ लक्षणछन्दोविवर्जितोऽयम् । अयं कः एहु
इसप्रकार चौबीस दोहोंके महास्थलमें आराधक पुरुषके लक्षण तीन दोहोंमें कहके छट्ठा
अंतरस्थल समाप्त हुआ ।
आगे शास्त्रके फलके कथनकी मुख्यताकर एक दोहा और उद्धतपनेके त्यागकी
मुख्यताकर दो दोहे, इस तरह तीन दोहोंमें व्याख्यान करते हैं —
गाथा – २१०
अन्वयार्थ : — [एष परमात्मप्रकाशः ] यह परमात्मप्रकाश [सुभावेन भावितः ] शुद्ध
भावोंकर भाया हुआ [चतुर्गतिदुःखविनाशम् ] चारों गतिके दुखोंका विनाश [करोति ] करता
है । जो परमात्मप्रकाश [लक्षणछंदोविवर्जितः ] यद्यपि व्यवहारनयकर प्राकृतरूप दोहा छंदोकर
सहित है, और अनेक लक्षणोंकर सहित हैं, तो भी निश्चयनयकर परमात्मप्रकाश जो
शुद्धात्मस्वरूप वह लक्षण और छंदोकर रहित है ।
भावार्थ : — शुभ लक्षण और प्रबंध ये दोनों परमात्मामें नहीं हैं । परमात्मा शुभाशुभ
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sUtrothI chhaThThun antarasthaL samApta thayun.
have, shAstranA phaLakathananI mukhyatAthI ek gAthAsUtra ane tyAr pachhI uddhatAInA tyAganI
mukhyatAthI be gAthAsUtro sudhI vyAkhyAn kare chhe. te A pramANe —
bhAvArtha — joke A paramAtmaprakAshagranth shAstrakramanA vyavahArathI dohAchhandathI ane