Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (English transliteration). Gatha: 211 (Adhikar 2).

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yogIndudevavirachita
[ adhikAr-2 dohA-211
परमप्पपयासु एष परमात्मप्रकाशः एवंगुणविशिष्टोऽयं किं करोति कुणइ करोति कम्
चउ-गइ-दुक्ख-विणासु चतुर्गतिदुःखविनाशम् कथंभूतः सन् भावियउ भावितः केन
सुहावइं शुद्धभावेनेति तथाहि यद्यप्ययं परमात्मप्रकाशग्रन्थः शास्त्रक्रमव्यवहारेण दोहकछन्दसा
प्राकृतलक्षणेन च युक्त :, तथापि निश्चयेन परमात्मप्रकाशशब्दवाच्यशुद्धात्मस्वरूपापेक्षया लक्षण-
छन्दोविवर्जितः
एवंभूतः सन्नयं किं करोति शुद्धभावनया भावितः सन् शुद्धात्म-
संवित्तिसमुत्पन्नरागादिविकल्परहितपरमानन्दैकलक्षणसुखविपरीतानां चतुर्गतिदुःखानां विनाशं
करोतीति भावार्थः
।।२१०।।
अथ श्रीयोगीन्द्रदेव औद्धत्यं परिहरति
३४२) इत्थु ण लेवउ पंडियहिँ गुण-दोसु वि पुणरुत्तु
भट्ट-पभायर-कारणइँ मइँ पुणु पुणु वि पउत्तु ।।२११।।
अत्र न ग्राह्यः पण्डितैः गुणो दोषोऽपि पुनरुक्त :
भट्टप्रभाकरकारणेन मया पुनः पुनरपि प्रोक्त म् ।।२११।।
लक्षणोंकर रहित है, और जिसके कोई प्रबंध नहीं, अनंतरूप है, उपयोगलक्षणमय परमानंद
लक्षणस्वरूप है, सो भावोंसे उसको आराधो, वही चतुर्गतिके दुःखोंका नाश करनेवाला है
शुद्ध परमात्मा तो व्यवहार लक्षण और श्रुतरूप छंदोंसे रहित है, इनसे भिन्न निज लक्षणमयी
है, और यह परमात्मप्रकाशनामा अध्यात्म
ग्रंथ यद्यपि दोहेके छंदरूप है, और प्राकृत लक्षणरूप
है, परंतु इसमें स्वसंवेदनज्ञानकी मुख्यता है, छंद अलंकारादिकी मुख्यता नहीं है ।।२१०।।
आगे श्रीयोगींद्रदेव उद्धतपनेका त्याग दिखलाते हैं
गाथा२११
अन्वयार्थ :[यत्र ] श्रीयोगींद्रदेव कहते हैं, अहो भव्यजीवो, इस ग्रंथमें
[पुनरुक्तः ] पुनरुक्तिका [गुणो दोषोऽपि ] दोष भी [पंडितैः ] आप पंडितजन [न ग्राह्यः ]
prAkRitalakShaNathI yukta chhe topaN nishchayathI ‘paramAtmaprakAsh’ shabdathI vAchya evA shuddhAtmasvarUpanI
apekShAe lakShaN ane chhandathI rahit chhe evo A paramAtmaprakAsh shuddhabhAvanAthI bhAvavAmAn Avato
thako, shuddhAtmasamvittithI utpanna rAgAdi vikalpa rahit paramAnand jenun ek lakShaN chhe evA sukhathI
viparIt chAr gatinAn dukhono vinAsh kare chhe, e bhAvArtha chhe. 210.
have, shrI yogIndradev uddhatapaNAno parihAr kare chhe