adhikAr-2 dohA-211 ]paramAtmaprakAsha [ 547
इत्थु इत्यादि । इत्थु अत्र ग्रन्थे ण लेवउ न ग्राह्यः । कैः । पंडियहिँ पण्डितैर्विवेकिभिः ।
कोऽसौ । गुण-दोसु वि गुणो दोषोऽपि । कथंभूतः । पुणरुत्तु पुनरुक्त : । कस्मान्न ग्राह्यः । यतः
मइँ पुणु पुणु वि पउत्तु मया पुनः पुनः प्रोक्त म् । किं तत् । वीतरागपरमात्मतत्त्वम् । किमर्थम् ।
भट्ट-पभायर-कारणइँ प्रभाकरभट्टनिमित्तेनेति । अत्र भावनाग्रन्थे समाधिशतकादिवत् पुनरुक्त दूषणं
नास्ति इति । तदपि कस्मादिति चेत् । अर्थं पुनःपुनश्चिन्तनलक्षणमिति वचनादिति मत्वा
प्रभाकरभट्टव्याजेन समस्तजनानां सुखबोधार्थं बहिरन्तःपरमात्मभेदेन तु त्रिविधात्मतत्त्वं
बहुधाप्युक्त मिति भावार्थः । ।।२११।।
अथ —
३४३) जं मइँ किं पि विजंपियउ जुत्ताजुत्तु वि इत्थु ।
तं वर – णाणि खमंतु महु जे बुज्झहिँ परमत्थु ।।२१२।।
ग्रहण नहीं करें, और कवि – कलाका गुण भी न लें, क्योंकि [मया ] मैंने [भट्टप्रभाकरकारणेन ]
प्रभाकरभट्टके संबोधनके लिए [पुनः पुनरपि प्रोक्तम् ] वीतराग परमानंदरूप परमात्मतत्त्वका
कथन बार – बार किया है ।।
भावार्थ : — इस शुद्धात्म – भावनाके ग्रंथमें पुनरुक्तका दोष नहीं लगता । समाधितंत्र
ग्रंथकी तरह इस ग्रंथमें भी बार बार शुद्ध स्वरूपका ही कथन किया है, बारम्बार उसी अर्थका
चिंतवन है, ऐसा जानकर इसका रहस्य (अभिप्राय) बार बार चिंतवना । प्रभाकरभट्टकी
मुख्यताकर समस्त जीवोंको सुखसे प्रतिबोध होनेके लिये इस ग्रंथमें बार – बार बहिरात्मा
अंतरात्मा और परमात्माका कथन किया है, ऐसा जानना ।।२११।।
आगे श्रीयोगीन्द्राचार्य ज्ञानीजनोंसे प्रार्थना करते हैं, कि मैंने जो किसी जगह छंद
अलंकारादिमें युक्त-अयुक्त कहा हो, तो उसे पंडितजन परमार्थके जाननेवाले मुझ पर क्षमा करें —
bhAvArtha — (shuddha AtmAnI) bhAvanAnA A granthamAn, samAdhishatak Adi granthanI jem,
punaruktino doSh Avato nathI, kAraN ke artha vAramvAr chintanasvarUp chhe. ‘(arthanun chintan vAramvAr
karavA yogya chhe.)’ evun Agamanun vachan chhe em jANIne prabhAkarabhaTTanA bahAne samasta janone
sukhathI bodh thAy e hetuthI bahirAtmA, antarAtmA ane paramAtmAnA bhedathI traN prakAranA
Atmatattvanun anek prakAre paN kathan karavAmAn Avyun chhe, em bhAvArtha chhe. 211.
vaLI, have shrI yogIndrAchArya gnAnI janone prArthanA kare chhe ke men koI jagyAe chhand,
alankAr AdimAn yogya, ayogya kahyun hoy to tenA – paramArthanA jANanAr panDitajan mane kShamA
kare —