548 ]
yogIndudevavirachita
[ adhikAr-2 dohA-212
यन्मया किमपि विजल्पितं युक्तायुक्त मपि अत्र ।
तद् वरज्ञानिनः क्षाम्यन्तु मम ये बुध्यन्ते परमार्थम् ।।२१२।।
जं इत्यादि । मइं किं पि विजंपियउ यन्मया किमपि जल्पितम् । किं जुत्ताजुत्तु वि
शब्दविषये अर्थविषये वा युक्तायुक्त मपि इत्थु अत्र परमात्मप्रकाशभिधानग्रन्थे खमंतु क्षमां
कुर्वन्तु । किं तत् । पूर्वोक्त दूषणम् । के । वर-णाणि वीतरागनिर्विकल्पस्वसंवेदनज्ञानयुक्ता
विशिष्टज्ञानिनः । कस्य । महु मम योगीन्द्रदेवाभिधानस्य । कथंभूता ये ज्ञानिनः जे बुज्झहिं ये
केचन बुध्यन्ते जानन्ति । कम् । परमत्थु रागादिदोषरहितमनन्तज्ञानदर्शनसुखवीर्यसहितं च
परमार्थशब्दवाच्यं शुद्धात्मानमिति भावार्थः ।।२१२।। इति सूत्रत्रयेण सप्तममन्तरस्थलं गतम् ।
एवंसप्तभिरन्तस्थलैश्चतुर्विंशतिसूत्रप्रमितं महास्थलं समाप्तम् ।
bhAvArtha — paramAtmaprakAsh nAmanA granthamAn shabdanA viShayamAn ke arthanA viShayamAn je
kAI mArAthI yukta ke ayukta kahevAyun hoy te pUrvokta doShanI, vItarAg nirvikalpa
svasamvedanarUpagnAnathI yukta vishiShTa gnAnIo — ke jeo rAgAdi doSh rahit ane anantagnAn,
anantadarshan, anantasukh ane anantavIryathI yukta, ‘paramArtha’ shabdathI vAchya evA shuddha AtmAne
jANe chhe teo-yogIndradev jenun nAm chhe evA mane kShamA kare, e bhAvArtha chhe. 212.
e pramANe traN gAthAsUtrathI sAtamun antarasthaL samApta thayun. e pramANe sAt
गाथा – २१२
अन्वयार्थ : — [अत्र ] इस ग्रंथमें [यत् ] जो [मया ] मैंने [किमपि ] कुछ भी
[युक्तायुक्तमपि विजल्पितं ] युक्त अथवा अयुक्त शब्द कहा होवे, तो [तत् ] उसे [ये
वरज्ञानिनः ] जो महान् ज्ञानके धारक [परमार्थम् ] परम अर्थको [बुध्यंते ] जानते हैं, वे
पंडितजन [मम क्षाम्यंतु ] मेरे ऊ पर क्षमा करें ।
भावार्थ : — मेरी छद्मस्थकी बुद्धि है, जो कदाचित् मैंने शब्दमें, अर्थमें, तथा छंद
अलंकारमें, अयुक्त कहा हो, वह मेरा दोष क्षमा करो, सुधार लो, जो विवेकी परम अर्थको
अच्छी तरह जानते हैं, वे मुझ पर कृपा करो, मेरा दोष न लो । यह प्रार्थना योगीन्द्राचार्यने
महामुनियोंसे की । जो महामुनि अपने शुद्ध स्वरूपको अच्छी तरह अपनेमें जानते हैं । जो
निजस्वरूप रागादि दोष रहित अनंतदर्शन, अनंतसुख, अनंतवीर्यकर सहित हैं, ऐसे अपने
स्वरूपको अपनेमें ही देखते हैं, जानते हैं, और अनुभवते हैं, वे ही इस ग्रंथके सुननेके योग्य
हैं, और सुधारनेके योग्य हैं ।।२१२।।
इसप्रकार तीन दोहोंमें सातवाँ अंतरस्थल कहा । इस तरह चौबीस दोहोंका