Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (English transliteration). Gatha: 214 (Adhikar 2) Antim Mangal.

< Previous Page   Next Page >


Page 550 of 565
PDF/HTML Page 564 of 579

 

background image
550 ]
yogIndudevavirachita
[ adhikAr-2 dohA-213
णिय-मणे फु रइ यस्य निजमनसि स्फु रति प्रतिभाति किं कर्मतापन्नम् तं तत्तं तत्तत्त्वम्
कथंभूतम् शुद्धं रागादिरहितम् पुनरपि कथंभूतं यत् जं तत्तं णाण-रूवं यदात्मतत्त्वं
ज्ञानरूपम् पुनरपि किंविशिष्टं यत् णिच्च झायंति नित्यं ध्यायन्ति क्व चित्त मनसि
के ध्यायन्ति परम-मुणि-गणा परममुनिसमूहाः पुनरपि किंविशिष्टं यत् जं तत्तं देह-
चत्तं यत्परमात्मतत्त्वं देहत्यक्तं देहाद्भिन्नम् पुनरपि कथंभूतं यत् णिवसइ निवसति क्व
भुवणे सव्व-देहीण देहे त्रिभुवने सर्वदेहिनां संसारिणां देहे पुनरपि कीद्रशं यत् जं तत्ते
दिव्व-देहं यत् शुद्धात्मतत्त्वं दिव्यदेहं दिव्यं केवलज्ञानादिशरीरम् शरीरमिति कोऽर्थः
स्वरूपम् पुनश्च कीद्रशं यत् तिहुयण-गुरुगं अव्याबाधानन्तसुखादिगुणेन त्रिभुवनादपि गुरुं
पूज्यमिति त्रिभुवनगुरुकम् पुनरपि किंरूपं यत् सिज्झए सिद्धयति निष्पत्तिं याति क्व
संत-जीवे ख्यातिपूजालाभादिसमस्तमनोरथविकल्पजालरहितत्वेन परमोपशान्त जीवस्वरूपे
इत्यभिप्रायः
।।२१३।।
अथ ग्रन्थस्यावसाने मङ्गलार्थमाशीर्वादरूपेण नमस्कारं करोति
३४५) परम-पय-गयाणं भासओ दिव्व-काओ
मणसि मुणिवराणं मुक्खदो दिव्वजोओ
kare chhe, je paramAtmatattva dehathI bhinna chhe ane traN lokamAn sarva sansArI prANIonA dehamAn
rahe chhe, je shuddhAtmatattva divyadeh chhe-kevaLagnAnAdi sharIr chhe-divya arthAt kevaLagnAnAdi, sharIr
arthAt svarUp chhe, je tattva avyAbAdh, anant sukhAdi guNothI traN lokathI paN guru chhe-pUjya
chhe ane je tattva khyAti, pUjA, lAbh AdithI mAnDIne samasta manoratharUp vikalpajALathI rahit
hovAne lIdhe paramashAntajIvasvarUpamAn siddha thAy chhe arthAt niShpattine pAme chhe te muktine pAme
chhe, e abhiprAy chhe. 213.
have, granthanA ante mangaLArthe AshIrvAdarUpe namaskAr kare chhe
पाता है अव्याबाध अनंतसुख आदि गुणोंकर वह तत्त्व तीन लोकका गुरु है, संतपुरुषोंके ही
हृदयमें वह तत्त्व सिद्ध होता है कैसे हैं संत ? जो अपनी बड़ाई, अपनी प्रतिष्ठा और लाभादि
समस्त मनोरथों और विकल्पजालोंसे रहित हैं, जिन्होंने अपना स्वरूप परमशांतभावरूप पा लिया
है
।।२१३।।
आगे ग्रंथके अन्तमंगलके लिये आशीर्वादरूप नमस्कार करते हैं