TIkAkAranun antim kathan ]paramAtmaprakAsha [ 553
प्रमितश्रीयोगीन्द्रदेवविरचितदोहकसूत्राणांविवरणभूता परमात्मप्रकाशवृत्तिः समाप्ता ।।
[टीकाकारस्यान्तिमकथनम्]
अत्र ग्रन्थे प्रचुरणे पदानां सन्धिर्न कृतः, वाक्यानि च भिन्नभिन्नानि कृतानि सुखबोधार्थम् ।
किं च परिभाषासूत्रं पदयोः संधिर्विवक्षितो न समासान्तरं तयोः तेन कारणेन
लिङ्गवचनक्रियाकारकसंधिसमासविशेष्यविशेषणवाक्यसमाप्त्यादिकं दूषणमत्र न ग्राह्यं विद्वद्भिरिति ।
इदं परमात्मप्रकाशवृत्तेर्व्याख्यानं ज्ञात्वा किं कर्तव्यं भव्यजनैः । सहजशुद्धज्ञानानन्दैक-
स्वभावोऽहं, निर्विकल्पोऽहं, उदासीनोऽहं, निजनिरञ्जनशुद्धात्मसम्यक्श्रद्धान ज्ञानानुष्ठानरूप-
अन्तके दो छन्द उन सहित तीनसौ पैंतालीस ३४५ दोहोंमें परमात्मप्रकाशका व्याख्यान
ब्रह्मदेवकृत टीका सहित समाप्त हुआ ।
[टीकाकारका अंतिम कथन ।]
इस ग्रंथमें बहुधा पदोंकी संधि नहीं की, और वचन भी जुदे-जुदे सुखसे समझनेके
लिये रक्खे गये हैं, समझनेके लिये कठिन संस्कृत नहीं रक्खी, इसलिये यहाँ लिंग, वचन,
क्रिया, कारक, संधि, समास, विशेष्य, विशेषणके दोष न लेना । जो पंडितजन विशेषज्ञ हैं,
वे ऐसा समझें, कि यह ग्रंथ बालबुद्धियोंके समझानेके लिये सुगम किया है । इस
परमात्मप्रकाशकी टीकाका व्याख्यान जानकर भव्यजीवोंको ऐसा विचार करना चाहिये, कि मैं
e pramANe shrIyogIndradev virachit 345 dohAsUtronI vivaraNarUp paramAtmaprakAshanI
vRutti (shrI brahmadevakRut TIkA sahit) samApta thaI.
[TIkAkAranun antim kathan]
sahelAIthI samajAy te mATe A granthamAn ghaNun karIne padonI sandhi karI nathI, ane vAkyo
judAn judAn karyAn chhe. vaLI sUtranI paribhAShAmAn padonI sandhi tenA samAsanI vachche vivakShit nathI
tethI ling, vachan, kriyA, kArak, sandhi, samAs, visheShya, visheShaN, vAkyasamApti AdinA doSh
vidvAnoe na grahavA.
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paramAtmaprakAshanI vRuttinun vyAkhyAn jANIne bhavyajanoe evo vichAr karavo joIe ke