तमेवम् । किं कृत्वा । वीतरागनिर्विकल्पसमाधौ स्थित्वेति । अत्र य एव शुद्धात्मानुभूतिरहितदेहे
वसन्नपि देहममत्वपरिणामेन सहितानां हेयः स एव शुद्धात्मा देहममत्वपरिणामरहितानामुपादेय
इति भावार्थः ।।३४।।
अथ यः समभावस्थितानां योगिनां परमानन्दं जनयन् कोऽपि शुद्धात्मा स्फु रति
तमाह —
३५) जो सम-भाव-परिट्ठियहँ जोइहँ कोइ फु रेइ ।
परमाणंदु जणंतु फु डु सो परमप्पु हवेइ ।।३५।।
यः समभावप्रतिष्ठितानां योगिनां कश्चित् स्फु रति ।
परमानन्दं जनयन् स्फु टं स परमात्मा भवति ।।३५।।
यः कोऽपि परमात्मा जीवितमरणलाभालाभसुखदुःखशत्रुमित्रादिसमभावपरिणत-
स्वरूपको वीतराग निर्विकल्पसमाधिमें तिष्ठकर चिंतवन करो । यह आत्मा जड़रूप देहमें
व्यवहारनयकर रहता है, सो देहात्मबुद्धिवालेको नहीं मालूम होती है, वही शुद्धात्मा देहके
ममत्वसे रहित (विवेकी) पुरुषोंके आराधने योग्य है ।।३४।।
आगे जो योगी समभावमें स्थित हैं, उनको परमानन्द उत्पन्न करता हुआ कोई शुद्धात्मा
स्फु रायमान है, उसका स्वरूप कहते हैं —
गाथा – ३५
अन्वयार्थ : — [समभावप्रतिष्ठितानां ] समभाव अर्थात् जीवित, मरण, लाभ,
अलाभ, सुख, दुःख, शत्रु, मित्र इत्यादि इन सबमें समभावको परिणत हुए [योगिनां ]
vItarAg nirvikalpa samAdhimAn sthit thaIne tun jAN.
ahIn shuddhAtmAnubhUtithI rahit dehamAn rahevA chhatAn dehanA mamatvapariNAmavALAne
je hey chhe te ja shuddhAtmA, dehanA mamatvapariNAm vinAnA jIvone upAdey chhe evo bhAvArtha
chhe. 34.
have samabhAvamAn sthit yogIone paramAnand utpanna karato je koI shuddha AtmA
sphurAyamAn thAy chhe tenun svarUp kahe chhe —
bhAvArtha — jIvit-maraN, lAbh-alAbh, sukh-dukh, shatru-mitrAdimAn samabhAve
adhikAr-1 dohA-35 ]paramAtmaprakAsha [ 65