Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (itrans transliteration). Gatha-102 (Adhikar 1).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
shrI diga.nbar jain svAdhyAyama.ndir TrasTa, sonagaDh - 364250
168 ]yogIndudevavirachit: [ adhikAr-1 : dohA-102
यथानिर्मेघाकाशे रविरागो रविप्रकाशः, स्वं परं च प्रकाशयति तथा वीतरागनिर्विकल्पसमाधिरूपे
कारणसमयसारे स्थित्वा मोहमेघपटले विनष्टे सति परमात्मा छद्मस्थावस्थायां
वीतरागभेदभावनाज्ञानेन स्वं परं च प्रकाशयतीत्येष पश्चादर्हदवस्थारूपकार्यसमयसाररूपेण
परिणम्य केवलज्ञानेन स्वं परं च प्रकाशयतीत्येष आत्मवस्तुस्वभावः संदेहो नास्तीति
अत्र
योऽसौ केवलज्ञानाद्यनन्तचतुष्टयव्यक्ति रूपः कार्यसमयसारः स एवोपादेय इत्यभिप्रायः ।।१०१।।
अथास्मिन्नेवार्थे पुनरपि व्यक्त्यर्थं द्रष्टान्तमाह
१०२) तारायणु जलि बिंबियउ णिम्मलि दीसइ जेम
अप्पए णिम्मलि बिंबियउ लोयालोउ वि तेम ।।१०२।।
तारागणः जले बिम्बितः निर्मले द्रश्यते यथा
आत्मनि निर्मले बिम्बितं लोकालोकमपि तथा ।।१०२।।
कुछ प्रकाशित करता है, पीछे अरहंत अवस्थारूप कार्यसमयसार स्वरूप परिणमन करके
केवलज्ञानसे निज और परको सब द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावसे प्रकाशता है
यह आत्म-वस्तुका
स्वभाव है, इसमें संदेह नहीं समझना इस जगह ऐसा सारांश है, कि जो केवलज्ञान,
केवलदर्शन, अनंतसुख, अनंतवीर्यरूप, कार्यसमयसार है, वही आराधने योग्य है ।।१०१।।
गाथा१०२
आगे इसी अर्थको फि र भी खुलासा करनेके लिये दृष्टान्त देकर कहते हैं
अन्वयार्थ :[यथा ] जैसे [तारागणः ] ताराओंका समूह [निर्मले जले ] निर्मल
जलमें [बिम्बितः ] प्रतिबिम्बित हुआ [दृश्यते ] प्रत्यक्ष दिखता है, [तथा ] उसी तरह [निर्मले
आत्मनि ] मिथ्यात्व रागादि विकल्पोंसे रहित स्वच्छ आत्मामें [लोकालोकं अपि ] समस्त
लोक-अलोक भासते हैं
moharUpI meghapaTalano nAsh thatA.n, paramAtmA Chadmastha-avasthAmA.n vItarAg bhedabhAvanArUp j~nAn
vaDe sva ane parane prakAshe Che, paChI arha.nt-avasthArUp kAryasamayasArarUpe pariNamIne
kevaLaj~nAnathI sva ane parane prakAshe Che. evo Atmavastuno svabhAv Che emA.n sa.ndeh nathI.
ahI.n, kevaLaj~nAnAdi ana.nt chatuShTayanI vyaktirUp je kAryasamayasAr Che te ja upAdey Che,
evo abhiprAy Che. 101.
have, pharI A ja arthane spaShTa karavA mATe draShTA.nt kahe Che :