Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
shrI diga.nbar jain svAdhyAyama.ndir TrasTa, sonagaDh - 364250
adhikAr-1 : dohA-103 ]paramAtmaprakAsh: [ 169
तारायणु जलि बिंबियउ तारागणो जले बिम्बितः प्रतिफ लितः । कथंभूते जले ।
णिम्मलि दीसइ जेम निर्मले द्रश्यते यथा ।द्रार्ष्टान्तमाह । अप्पए णिम्मलि बिंबियउ लोयालोउ
वि तेम आत्मनि निर्मले मिथ्यात्वरागादिविकल्पजालरहिते १बिम्बितं लोकालोकमपि तथा द्रश्यत
इति । अत्र विशेषव्याख्यानं यदेव पूर्वद्रष्टान्तसूत्रे व्याख्यानमत्रापि तदेव ज्ञातव्यम् । कस्मात् ।
अयमपि तस्य द्रष्टान्तस्य द्रढीकरणार्थमिति सूत्रतात्पर्यार्थः ।।१०२।।
अथात्मा परश्च येनात्मना ज्ञानेन ज्ञायते तमात्मानं स्वसंवेदनज्ञानबलेन जानीहीति
कथयति —
१०३) अप्पु वि परु वि वियाणइ जेँ अप्पेँ मुणिएण ।
सो णिय-अप्पा जाणि तुहुँ जोइय णाण-बलेण ।।१०३।।
आत्मापि परः अपि विज्ञायते येन आत्मना विज्ञातेन ।
तं निजात्मानं जानीहि त्वं योगिन् ज्ञानबलेन ।।१०३।।
bhAvArtha: — ahI.n pUrvadraShTA.ntasUtramA.n je visheSh vyAkhyAn kahyu.n hatu.n te ja vyAkhyAn
ahI.n paN jANavu.n, kAraN ke A sUtra paN te draShTA.ntane draDh karavA arthe Che evo sUtrano
tAtparyArtha Che. 102.
have, je AtmAne jANatA.n sva ane par jaNAy Che te AtmAne tu.n svasa.nvedanarUp j~nAnanA
baL vaDe jAN, em kahe Che : —
भावार्थ : — इसका विशेष व्याख्यान जो पहले कहा था, वही यहाँ पर जानना अर्थात्
जो सबका ज्ञाता द्रष्टा आत्मा है, वही उपादेय है । यह सूत्र भी पहले कथनको दृढ़ करनेवाला
है ।।१०२।।
आगे जिस आत्माके जाननेसे निज और पर सब पदार्थ जाने जाते हैं, उसी आत्माको
तू स्वसंवेदन ज्ञानके बलसे जान, ऐसा कहते हैं —
गाथा – १०३
अन्वयार्थ : — [येन आत्मना विज्ञातेन ] जिस आत्माको जाननेसे [आत्मा अपि ]
आप और [परः अपि ] पर सब पदार्थ [विज्ञायते ] जाने जाते हैं, [तं निजात्मानं ] उस अपने
आत्माको [योगिन् ] हे योगी [त्वं ] तू [ज्ञानबलेन ] आत्मज्ञानके बलसे [जानीहि ] जान ।
1. pAThAntar: — बिम्बितं = बिम्बितं प्रतिबिंबितं