Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
shrI diga.nbar jain svAdhyAyama.ndir TrasTa, sonagaDh - 364250
द्वितीय – महाधिकारः ।
अत ऊर्ध्वं स्थलसंख्याबहिर्भूतान् प्रक्षेपकान् विहाय चतुर्दशाधिकशतद्वय प्रमितैर्दोहक-
सूत्रैर्मोक्षमोक्षफ लमोक्षमार्गप्रतिपादनमुख्यत्वेन द्वितीयमहाधिकारः प्रारभ्यते । तत्रादौ सूत्रदशक-
पर्यन्तं मोक्षमुख्यतया व्याख्यानं करोति । तद्यथा —
१२७) सिरिगुरु अक्खहि मोक्खु महु मोक्खहँ कारणु तत्थु ।
मोक्खहँ केरउ अण्णु फ लु जेँ जाणउँ परमत्थु ।।१।।
श्रीगुरो आख्याहि मोक्षं मम मोक्षस्य कारणं तथ्यम् ।
मोक्षस्य संबन्धि अन्यत् फ लं येन जानामि परमार्थम् ।।१।।
द्वितीय महाधिकार
इसके बाद प्रकरणको संख्याके बाहर अर्थात् क्षेपकोंके सिवाय दोसौ चौदह दोहा –
सूत्रोंसे मोक्ष, मोक्ष – फ ल और मोक्ष-मार्गके कथनकी मुख्यतासे दूसरा महा अधिकार आरंभ
करते हैं । उसमें भी पहले दस दोहों तक मोक्षकी मुख्यतासे व्याख्यान करते हैं —
गाथा – १
अन्वयार्थ : — [श्रीगुरो ] हे श्रीगुरु, [मम ] मुझे [मोक्षं ] मोक्ष [तथ्यम् मोक्षस्य
कारणं ] सत्यार्थ मोक्षका कारण, [अन्यत् ] और [मोक्षस्य संबंधि ] मोक्षका [फ लं ] फ ल
[आख्याहि ] कृपाकर कहो [येन ] जिससे कि मैं [परमार्थं ] परमार्थको [जानामि ] जानूँ ।।
dvitIy mahAdhikAr
tyAr paChI sthaL sa.nkhyAthI bahirbhUt (prakaraNanI sa.nkhyAthI bahAr) prakShepakone ChoDIne baso
chaud dohakasUtrothI mokSha, mokShaphaL ane mokShamArganA kathananI mukhyatAthI bIjo mahAdhikAr sharU
karavAmA.n Ave Che : —
temA.n paN pahelA.n das dohakasUtro sudhI mokShanI mukhyatAthI vyAkhyAn kare Che. te A
pramANe : —
adhikAr-2 : dohA-1 ]paramAtmaprakAsh: [ 201