Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
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पृष्टं त्वया कर्तृभूतेन । पुनरपि कः पृष्टः । मोक्खहं हेउ मोक्षस्य हेतुः कारणम् । तत् जिण-
भासिउ जिनभाषितं णिसुणि निश्चयेन शृणु समाकर्णय तुहुं त्वं जेण येन त्रयेण ज्ञानेन
वियाणहि भेउ विजानासि भेदं त्रयाणां सम्बन्धिनमिति । अयमत्र तात्पर्यार्थः । श्रीयोगीन्द्रदेवाः
कथयन्ति हे प्रभाकरभट्ट शुद्धात्मोपलम्भलक्षणं मोक्षं केवलज्ञानाद्यनन्तचतुष्टयव्यक्ति रूपं मोक्षफ लं
भेदाभेदरत्नत्रयात्मकं मोक्षमार्गं च क्रमेण प्रतिपादयाम्यहं त्वं शृण्विति ।।२।।
अथ धर्मार्थकाममोक्षाणां मध्ये सुखकारणत्वान्मोक्ष एवोत्तम इति अभिप्रायं मनसि
संप्रधार्य सूत्रमिदं प्रतिपादयति —
१२९) धम्मह अत्थहँ कामहँ वि एयहँ सयलहँ मोक्खु ।
उत्तमु पभणहिँ णाणि जिय अण्णेँ जेण ण सोक्खु ।।३।।
धर्मस्य अर्थस्य कामस्यापि एतेषां सकलानां मोक्षम् ।
उत्तमं प्रभणन्ति ज्ञानिनः जीव अन्येन येन न सौख्यम् ।।३।।
प्राप्तिरूप मोक्ष, केवलज्ञानादि अनंतचतुष्टयका प्रगटपना स्वरूप मोक्ष-फ ल, और निश्चय
व्यवहाररत्नत्रयरूप मोक्षका मार्ग, इन तीनोंको क्रमसे जिनआज्ञाप्रमाण तुझको कहूँगा । उनको
तू अच्छी तरह चित्तमें धारण कर, जिससे सब भेद मालूम हो जावेगा ।।२।।
अब धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारोंमें सुखका मूलकारण मोक्ष ही सबसे उत्तम
है, ऐसा अभिप्राय मनमें रखकर इस गाथा – सूत्रको कहते हैं —
गाथा – ३
अन्वयार्थ : — [जीव ] हे जीव, [धर्मस्य ] धर्म, [अर्थस्य ] अर्थ [कामस्य अपि ]
और काम [एतेषां सकलानां ] इन सब पुरुषार्थोंमेंसे [मोक्षम् उत्तमं ] मोक्षको उत्तम
[ज्ञानिनः ] ज्ञानी पुरुष [प्रभणंति ] कहते हैं, [येन ] क्योंकि [अन्येन ] अन्य धर्म, अर्थ,
कामादि पदार्थोंमें [सौख्यम् ] परमसुख [न ] नहीं है ।
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