Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (itrans transliteration).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
shrI diga.nbar jain svAdhyAyama.ndir TrasTa, sonagaDh - 364250
धम्महं इत्यादि धम्महं धर्मस्य धर्माद्वा अत्थहं अर्थस्य अर्थाद्वा कामहवि कामस्यापि
कामाद्वा एयहं सयलहं एतेषां सकलानां संबन्धित्वेन एतेभ्यो वा सकाशात् मोक्खु मोक्षं उत्तमु
पभणहिं उत्तमं विशिष्टं प्रभणन्ति
के कथयन्ति णाणि ज्ञानिनः जिय हे जीव कस्मादुत्तमं
प्रभणन्ति मोक्षम् अण्णें अन्येन धर्मार्थकामादिना जेण येन कारणेन ण सोक्खु नास्ति
परमसुखम् इति तद्यथाधर्मशब्देनात्र पुण्यं कथ्यते अर्थशब्देन तु पुण्यफ लभूतार्थो राज्यादि-
विभूतिविशेषः, कामशब्देन तु तस्यैव राज्यस्य मुख्यफ लभूतः स्त्रीवस्त्रगंध माल्यादिसंभोगः
एतेभ्यस्त्रिभ्यः सकाशान्मोक्षमुत्तमं कथयन्ति के ते वीतरागनिर्विकल्पस्वसंवेदनज्ञानिनः
कस्मात् आकुलत्वोत्पादकेन वीतरागपरमानन्दसुखामृतरसास्वादविपरीतेन धर्मार्थकामादिना
मोक्षादन्येन येन कारणेन सुखं नास्तीति भावार्थः ।।।।
अथ धर्मार्थकामेभ्यो यद्युत्तमो न भवति मोक्षस्तर्हि तत्त्रयं मुक्त्वा परलोकशब्दवाच्यं मोक्षं
किमिति जिना गच्छन्तीति प्रकटयन्ति
भावार्थ :धर्म शब्दसे यहाँ पुण्य समझना, अर्थ शब्दसे पुण्यका फ ल राज्य वगैरह
संपदा जानना, और काम शब्दसे उस राज्यका मुख्यफ ल स्त्री, कपड़े, सुगंधितमाला आदि
वस्तुरूप भोग जानना
इन तीनोंसे परमसुख नहीं हैं, क्लेशरूप दुःख ही है, इसलिये इन सबसे
उत्तम मोक्षको ही वीतरागसर्वज्ञदेव कहते हैं, क्योंकि मोक्षसे जुदा जो धर्म, अर्थ, काम हैं, वे
आकुलताके उत्पन्न करनेवाले हैं, तथा वीतराग, परमानन्दसुखरूप अमृतरसके आस्वादसे
विपरीत हैं, इसलिये सुखके करनेवाले नहीं हैं, ऐसा जानना
।।।।
आगे धर्म, अर्थ, काम इन तीनोंसे जो मोक्ष उत्तम नहीं होता तो इन तीनोंको छोड़कर
जिनेश्वरदेव मोक्षको क्यों जाते ? ऐसा दिखाते हैं
bhAvArtha:atre ‘dharma’ shabdathI puNya samajavu.n, ‘artha’ shabdathI puNyanA phaLarUp rAjyAdi
vibhUti visheSh sa.npadA samajavI ane ‘kAm’ shabdathI te rAjyanA mukhya phaLarUp strI, vastra, ga.ndh,
mALA Adino bhog samajavo. A traN karatA.n mokSha uttam Che, em vItarAg nirvikalpa
svasa.nvedanavALA j~nAnIo kahe Che. kAraN ke AkuLatAnA utpAdak, vItarAg-paramAna.ndarUp
sukhAmR^itarasanA AsvAdathI viparIt ane mokShathI anya evA dharma, artha ane kAmathI sukh thatu.n
nathI. 3.
have jo dharma, artha ane kAmathI mokSha uttam na hoy to te traNeyane ChoDIne ‘paralok’
shabdathI vAchya evA mokShamA.n jinadevo shA mATe jAy? em darshAve Che :
ahI.n, ‘paralok’ shabdathI vAchya evu.n paramAtmadhyAn (paramAtmAnu.n avalokan) samajavu.n,
paN kAyamokSha na samajavo.
204 ]yogIndudevavirachit: [ adhikAr-2 : dohA-3