Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
shrI diga.nbar jain svAdhyAyama.ndir TrasTa, sonagaDh - 364250
धर्मद्रव्ये विद्यमानेऽपि जलवत्, घटोत्पत्तौ कुम्भकारबहिरङ्गनिमित्तेऽपि चक्रचीवरादिवत्,
जीवानां धर्मद्रव्ये विद्यमानेऽपि कर्मनोकर्मपुद्गला गतेः सहकारिकारणं, पुद्गलानां तु कालद्रव्यं
गतेः सहकारिकारणम् । कुत्र भणितमास्ते इति चेत् । पञ्चास्तिकायप्राभृते-
श्रीकुन्दकुन्दाचार्यदेवैः सक्रियनिःक्रियव्याख्यानकाले भणितमस्ति — ‘‘जीवा पुग्गलकाया सह
सक्किरिया हवंति ण य सेसा । पुग्गलकरणा जीवा खंदा खलु कालकरणेहिं ।।’’ पुद्गल-
है । कोई प्रश्न करे कि गतिका सहकारी धर्म है, कालको क्यों कहा ? उसका समाधान यह
है कि सहकारीकारण बहुत होते हैं, और उपादानकारण एक ही होता है, दूसरा द्रव्य नहीं होता,
निज द्रव्य ही निज (अपनी) गुण – पर्यायोंका मूलकारण है, और निमित्तकारण बहिरंगकारण
तो बहुत होते हैं, इसमें कुछ दोष नहीं है । धर्मद्रव्य तो सबहीका गतिसहायी है, परंतु
मछलियोंको गतिसहायी जल है, तथा घटकी उत्पत्तिमें बहिरंगनिमित्त कुम्हार है, तो भी दंड,
चक्र, चीवरादिक ये भी अवश्य कारण हैं, इनके बिना घट नहीं होता, और जीवोंके धर्मद्रव्य
गतिका सहायी विद्यमान है, तो भी कर्म-नोकर्म पुद्गल सहकारीकारण हैं, इसी तरह पुद्गलको
कालद्रव्य गति सहकारीकारण जानना । यहाँ कोई प्रश्न करे कि धर्मद्रव्य तो गतिका सहायी
सब जगह कहा है, और कालद्रव्य वर्तनाका सहायी है, गति सहायी किस जगह कहा है ?
उसका समाधान श्रीपंचास्तिकायमें कुंदकुंदाचार्यने क्रियावंत और अक्रियावंतके व्याख्यानमें
कहा है । ‘‘जीवा पुग्गल’’ इत्यादि । इसका अर्थ ऐसा है कि जीव और पुद्गल ये दोनों
(atre koI prashna kare ke gamanamA.n dharmadravya sahakArI kAraN hoy Che ane Ap kALane
shA mATe sahakArI kAraN kaho Cho? tenu.n samAdhAn e Che ke) sahakArI kAraNo anek hoy Che.
matsyane gamanamA.n dharmadravya vidyamAn hovA ChatA.n paN, jaL sahakArI nimitta Che, ghaDAnI utpattimA.n
ku.nbhAranu.n bahira.ng nimitta hovA ChatA.n paN, chAkaDo, chIvarAdi sahakArI nimitta Che. jIvone
gamanamA.n dharmadravya vidyamAn hovA ChatA.n paN karma-nokarmarUp pudgalo sahakArI kAraN Che ane
pudgalone gatinu.n kALadravya sahakArI kAraN Che.
ahI.n, koI prashna kare ke (dharmadravyane to gatinu.n nimitta badhI jagyAe kahyu.n Che ane
kALadravyane vartanAnu.n kAraN kahyu.n Che) kALadravyane gatinu.n nimitta kaI jagyAe kahyu.n Che?
tenu.n samAdhAn : — pa.nchAstikAy prAbhR^itamA.n shrIku.ndaku.ndAchAryadeve sakriy-niShkriy vyAkhyAnakALe
(gAthA-98mA.n) kahyu.n Che ke : —
‘‘जीवा पुग्गलकाया सह सक्किरिया हवंति णय सेसा ।
पुग्गलकरणा जीवा खंदा खलु कालकारणेहिं ।।
244 ]yogIndudevavirachit: [ adhikAr-2 : dohA-23