Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (itrans transliteration).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
shrI diga.nbar jain svAdhyAyama.ndir TrasTa, sonagaDh - 364250
290 ]yogIndudevavirachit: [ adhikAr-2 : dohA-44
बिण्णि वि इत्यादि बिण्णि वि द्वावपि द्वौ कौ दोस दोषौ हवंति भवतः
तसु यस्य तपोधनस्य जो सम-भाउ करेइ यः समभावं करोति रागद्वेषत्यागं करोति
कौ तौ द्वौ दोषौ बंधु जि णिहणइ बन्धमेव निहन्ति कथंभूतं बन्धम् अप्पणउ
आत्मीयं अणु पुनः जगु जगत् प्राणिगणं गहिलु करेइ ग्रहिलं पिशाचसमानं विकलं
करोति
अयमत्र भावार्थः समशब्देनात्राभेदनयेन रागादिरहित आत्मा भण्यते, तेन
कारणेन योऽसौ समं करोति वीतरागचिदानन्दैक स्वभावं निजात्मानं परिणमति तस्य दोषद्वयं
भवति
कथमिति चेत् प्राकृतभाषया बन्धुशब्देन ज्ञानावरणादिबन्धा भण्यन्ते गोत्रं च
येन कारणेनोपशमस्वभावेन परमात्मस्वरूपेण परिणतः सन् ज्ञानावरणादिकर्मबन्धं निहन्ति
तेन कारणेन स्तवनं भवति, अथवा येन कारणेन बन्धुशब्देन गोत्रमपि भण्यते तेन
have, je sa.nyamI upashamabhAvane kare Che tenI ni.ndA dvArA stuti traN gAthAsUtro dvArA kahe
Che :
bhAvArtha:ahI.n abhedanayathI ‘sam’ shabdathI rAgAdi rahit AtmA samajavo;
tethI je koI samatA kare ChevItarAg chidAna.nd ja jeno ek svabhAv Che evA nij
AtmArUpe pariName Chetene be doSh Upaje Che. kevI rIte? prAkR^it bhAShAmA.n ‘ba.ndhu’ shabdathI
j~nAnAvaraNAdi karmano ba.ndh kahevAy Che ane bhAI paN kahevAy Che. je kAraNe upasham
(shA.nt) svabhAvathI paramAtmasvarUpe pariNamyo thako j~nAnAvaraNAdi karmaba.ndhane haNe Che te kAraNe
stuti thAy Che; je kAraNe ‘ba.ndhu’ shabdano artha bhAI paN levAy Che te ‘ba.ndhughAtI’ e
arthathI lokavyavahArabhAShAthI ni.ndA paN thAy Che (A doSh nathI paN guN Che, A ni.ndA
dvArA stuti Che.)
[आत्मीयं बंधं एव निहंति ] एक तो अपने बंधको नष्ट करता है, [पुनः ] दूसरे [जगद् ग्रहिलं
करोति ] जगत्के प्राणियोंको बावला
पागल बना देता है
भावार्थ :यह निंदा द्वारा स्तुति है प्राकृत भाषामें बंधु शब्दसे ज्ञानावरणादि कर्मबंध
भी लिया जाता है, तथा भाईको भी कहते हैं यहाँ पर बंधुहत्या निंद्य है, इससे एक तो
बंधुहत्याका दोष आया तथा दूसरा दोष यह है, कि जो कोई इनका उपदेश सुनता है, वह
वस्त्र आभूषणका त्यागकर नग्न दिगंबर हो जाता है कपड़े उतारकर नंगा हो जाना उसे लोग
गहलापागल कहते हैं ये दोनों लोकव्यवहारमें दोष हैं, इन शब्दोंके ऐसे अर्थ ऊ परसे निकाले
हैं परंतु दूसरे अर्थमें कोई दोष नहीं है, स्तुति ही है क्योंकि कर्मबंध नाश करने ही योग्य
है, तथा जो समभावका धारक है, वह आप नग्न दिगम्बर हो जाता है, और अन्यको दिगम्बर