Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Malayalam transliteration). Gatha-101 (Adhikar 1).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ശ്രീ ദിഗംബര ജൈന സ്വാധ്യായമംദിര ട്രസ്ട, സോനഗഢ - ൩൬൪൨൫൦
അധികാര-൧ : ദോഹാ-൧൦൧ ]പരമാത്മപ്രകാശ: [ ൧൬൭
आत्मस्वभावः कर्मतापन्नो, लघु शीघ्रम् न केवलमात्मस्वभावो द्रश्यते लोयालोउ असेसु
लोकालोकस्वरूपमप्यशेषं द्रश्यत इति अत्र विशेषेण पूर्वसूत्रोक्त मेव व्याख्यानचतुष्टयं ज्ञातव्यं
यस्मात्तस्यैव वृद्धमतसंवादरूपत्वादिति भावार्थः ।।१००।।
अतोऽमुमेवार्थं द्रष्टान्तद्रार्ष्टान्ताभ्यां समर्थयति
१०१) अप्पु पयासइ अप्पु परु जिम अंबरि रविराउ
जोइय एत्थु म भंति करि एहउ वत्थु-सहाउ ।।१०१।।
आत्मा प्रकाशयति आत्मानं परं यथा अम्बरे रविरागः
योगिन् अत्र मा भ्रान्तिं कुरु एष वस्तुस्वभावः ।।१०१।।
अप्पु पयासइ आत्मा कर्ता प्रकाशयति कम् अप्पु परु आत्मानं परं च यथा कः
किं प्रकाशयति जिमु अंबरि रविराउ यथा येन प्रकारेण अम्बरे रविरागः जोइय एत्थु म
भंति करि एहउ वत्थुसहाउ हे योगिन् अत्र भ्रांतिं मा कार्षीः, एष वस्तुस्वभावः इति तद्यथा
यह हैं, कि अपना स्वभाव शीघ्र दिख जाता है, और स्वभावके देखनेसे समस्त लोक भी दिखता
है
यहाँ पर भी विशेष करके पूर्व सूत्रकथित चारों तरहका व्याख्यान जानना चाहिये, क्योंकि
यही व्याख्यान बड़े-बड़े आचार्योंने माना है ।।१००।।
आगे इसी अर्थको दृष्टातदार्ष्टान्तसे दृढ़ करते हैं
गाथा१०१
अन्वयार्थ :[यथा ] जैसे [अंबरे ] आकाश में [रविरागः ] सूर्यका प्रकाश
अपनेको और परको प्रकाशित करता है, उसी तरह [आत्मा ] आत्मा [आत्मानं ] अपनेको
[परं ] पर पदार्थोंको [प्रकाशयति ] प्रकाशता है, सो [योगिन् ] हे योगी [अत्र ] इसमें [भ्रान्तिं
मा कुरु ] भ्रम मत कर
[एष वस्तुस्वभावः ] ऐसा ही वस्तुका स्वभाव है
भावार्थ :जैसे मेघ रहित आकाशमें सूर्यका प्रकाश अपनेको और परको प्रकाशता
है, उसी प्रकार वीतरागनिर्विकल्प समाधिरूप कारणसमयसारमें लीन होकर मोहरूप मेघ-
समूहका नाश करके यह आत्मा मुनि अवस्थामें वीतराग स्वसंवेदनज्ञानकर अपनेको और परको
ഭാവാര്ഥ:ജേവീ രീതേ വാദളാം വിനാനാ (നിര്മള) ആകാശമാം സൂര്യനോ പ്രകാശ പോതാനേ
അനേ പരനേ പ്രകാശേ ഛേ തേവീ രീതേ വീതരാഗ നിര്വികല്പ സമാധിരൂപ കാരണസമയസാരമാം സ്ഥിത ഥഈനേ,