Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Malayalam transliteration). Gatha-108 (Adhikar 1).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ശ്രീ ദിഗംബര ജൈന സ്വാധ്യായമംദിര ട്രസ്ട, സോനഗഢ - ൩൬൪൨൫൦
൧൭൬ ]യോഗീന്ദുദേവവിരചിത: [ അധികാര-൧ : ദോഹാ-൧൦൮
भणिदो णाणी य णिच्छदे धम्मं अपरिग्गहो दु धम्मस्स जाणगो तेण सो होदि ।।’’ ।।१०७।।
अथ
१०८) णाणिय णाणिउ णाणिएण णाणिउँ जा ण मुणेहि
ता अण्णाणिं णाणमउँ किं पर बंभु लहेहि ।।१०८।।
ज्ञानिन् ज्ञानी ज्ञानिना ज्ञानिनं यावत् न मन्यस्व
तावद् अज्ञानेन ज्ञानमयं किं परं ब्रह्म लभसे ।।१०८।।
णाणिय हे ज्ञानिन् णाणिउ ज्ञानी निजात्मा णाणिएण ज्ञानिना निजात्मना करणभूतेन
है, कि निज सिद्धांतमें परिग्रह रहित और इच्छा रहित ज्ञानी कहा गया है, जो धर्मको भी नहीं
चाहता है, अर्थात् जिसके व्यवहारधर्मकी भी कामना नहीं है, उसके अर्थ तथा कामकी इच्छा
कहाँसे होवे ? वह आत्मज्ञानी सब अभिलाषाओंसे रहित है, जिसके धर्मका भी परिग्रह नहीं
है, तो अन्य परिग्रह कहाँसे हो ? इसलिये वह ज्ञानी परिग्रही नहीं है, केवल निजस्वरूपका
जाननेवाला ही होता है
।।१०७।।
आगे ज्ञानसे ही परब्रह्मकी प्राप्ति होती है, ऐसा कहते हैं
गाथा१०८
अन्वयार्थ :[ज्ञानिन् ] हे ज्ञानी [ज्ञानी ] ज्ञानवान् अपना आत्मा [ज्ञानिना ]
सम्यग्ज्ञान करके [ज्ञानिनं ] ज्ञान लक्षणवाले आत्माको [यावत् ] जब तक [न ] नहीं
[जानासि ] जानता, [तावद् ] तब तक [अज्ञानेन ] अज्ञानी होनेसे [ज्ञानमयं ] ज्ञानमय [परं
ब्रह्म ] अपने स्वरूपको [किं लभसे ] क्या पा सकता है ? कभी नहीं पा सकता
जो कोई
आत्माको पाता है, तो ज्ञानसे ही पा सकता है
भावार्थ :जब तक यह जीव अपनेको आपकर अपनी प्राप्तिके लिये आपसे अपनेमें
य णिच्छदे धम्मं अपरिग्गहो दु धम्मस्स जाणगो तेण सो होदि ।।[അര്ഥ:അനിച്ഛകനേ അപരിഗ്രഹീ
കഹ്യോ ഛേ അനേ ജ്ഞാനീ ധര്മനേ (പുണ്യനേ) ഇച്ഛതോ നഥീ, തേഥീ തേ ധര്മനോ പരിഗ്രഹീ നഥീ, (ധര്മനോ) ജ്ഞായക
ജ ഛേ.] ൧൦൭.
ഹവേ, ജ്ഞാനഥീ ജ പരബ്രഹ്മനീ പ്രാപ്തി ഥായ ഛേ, ഏമ കഹേ ഛേ :
ഭാവാര്ഥ:ജ്യാം സുധീ കര്താരൂപ ആത്മാ കര്മരൂപ ആത്മാനേ, കരണരൂപ ആത്മാ വഡേ,