Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ശ്രീ ദിഗംബര ജൈന സ്വാധ്യായമംദിര ട്രസ്ട, സോനഗഢ - ൩൬൪൨൫൦
അധികാര-൨ : ദോഹാ-൩൧ ]പരമാത്മപ്രകാശ: [ ൨൬൫
च योऽसौ भक्त स्तस्येदं लक्षणं जानीहि । इदं किम् । यद्यपि व्यवहारेण सविकल्पावस्थायां
चित्तस्थितिकरणार्थं देवेन्द्रचक्रवर्त्यादि विभूतिविशेषकारणं परंपरया शुद्धात्मप्राप्तिहेतुभूतं पञ्च-
परमेष्ठिरूपस्तववस्तुस्तवगुणस्तवादिकं वचनेन स्तुत्यं भवति मनसा च तदक्षररूपादिकं
प्राथमिकानां ध्येयं भवति, तथापि पूर्वोक्त निश्चयरत्नत्रयपरिणतिकाले केवलज्ञानाद्यनन्तगुण-
परिणतः स्वशुद्धात्मैव ध्येय इति । अत्रेदं तात्पर्यम् । योऽसावनन्तज्ञानादिगुणः शुद्धात्मा ध्येयो
भणितः स एव निश्चयेनोपादेय इति ।।३१।।
अथ ये ज्ञानिनो निर्मलरत्नत्रयमेवात्मानं मन्यते शिवशब्दवाच्यं ते मोक्षपदाराधकाः सन्तो
निजात्मानं ध्यायन्तीति निरूपयति —
വചനഥീ സ്തവവാ യോഗ്യ ഛേ അനേ പ്രാഥമികോനേ മനഥീ തേനാ അക്ഷരരൂപാദിക ധ്യാവവാ യോഗ്യ ഛേ തോപണ,
പൂര്വോക്ത നിശ്ചയരത്നത്രയനീ പരിണതിനാ കാളേ കേവളജ്ഞാനാദി അനംതഗുണപരിണത സ്വശുദ്ധാത്മാ ജ ധ്യാവവാ
യോഗ്യ ഛേ.
അഹീം, ഏ താത്പര്യ ഛേ കേ അനംതഗുണവാളോ ജേ ശുദ്ധാത്മാ ധ്യാവവാ യോഗ്യ കഹ്യോ ഛേ തേ ജ
നിശ്ചയഥീ ഉപാദേയ ഛേ. ൩൧.
ഹവേ, ജേ ജ്ഞാനീഓ നിര്മലരത്നത്രയനേ ജ ആത്മാ മാനേ ഛേ തേഓ മോക്ഷപദനാ ആരാധകോ ‘ശിവ’
ശബ്ദഥീ വാച്യ ഏവാ നിജ ആത്മാനേ ധ്യാവേ ഛേ, ഏമ കഹേ ഛേ : —
उसके ये लक्षण हैं, यह जानो । वे कौनसे लक्षण हैं — यद्यपि व्यवहारनयकर सविकल्प
अवस्थामें चित्तके स्थिर करनेके लिये पंचपरमेष्ठीका स्तवन करता है, जो पंचपरमेष्ठीका स्तवन
देवेन्द्र चक्रवर्ती आदि विभूतिका कारण है, और परम्पराय शुद्ध आत्मतत्त्वकी प्राप्तिका कारण
है, सो प्रथम अवस्थामें भव्यजीवोंको पंचपरमेष्ठी ध्यावने योग्य हैं, उनके आत्माका स्तवन,
गुणोंकी स्तुति, वचनसे उनकी अनेक तरहकी स्तुति करनी, और मनसे उनके नामके अक्षर तथा
उनका रूपादिक ध्यावने योग्य हैं, तो भी पूर्वोक्त निश्चयरत्नत्रयकी प्राप्तिके समय केवलज्ञानादि
अनंतगुणरूप परिणत जो निज शुद्धात्मा वही आराधने योग्य है, अन्य नहीं । तात्पर्य यह है कि
ध्यान करने योग्य या तो निज आत्मा है, या पंचपरमेष्ठी हैं, अन्य नहीं, प्रथम अवस्थामें तो
पंचपरमेष्ठीका ध्यान करना योग्य है, और निर्विकल्पदशामें निजस्वरूप ही ध्यावने योग्य है,
निजरूप ही उपादेय हैं ।।३१।।
आगे जो ज्ञानी निर्मल रत्नत्रयको ही आत्मस्वरूप मानते हैं, और अपनेको ही
शिव जानते हैं, वे ही मोक्षपदके धारक हुए निज आत्माको ध्यावते हैं, ऐसा निरूपण
करते हैं —