Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Malayalam transliteration). Gatha-49 (Adhikar 2).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ശ്രീ ദിഗംബര ജൈന സ്വാധ്യായമംദിര ട്രസ്ട, സോനഗഢ - ൩൬൪൨൫൦
൨൯൮ ]യോഗീന്ദുദേവവിരചിത: [ അധികാര-൨ : ദോഹാ-൪൯
अथ बाह्याभ्यन्तरपरिग्रहेच्छापञ्चेन्द्रियविषयभोगाकांक्षादेहमूर्च्छाव्रतादिसंकल्पविकल्परहितेन
निजशुद्धात्मध्यानेन योऽसौ निजशुद्धात्मानं जानाति स परिग्रहविषयदेहव्रताव्रतेषु रागद्वेषौ न
करोतीति चतुःकलं प्रकटयति
१७६) गंथहँ उप्परि परम - मुणि देसु वि करइ ण राउ
गंथहँ जेण वियाणियउ भिण्णउ अप्प-सहाउ ।।४९।।
ग्रन्थस्य उपरि परममुनिः द्वेषमपि करोति न रागम्
ग्रन्थाद् येन विज्ञातः भिन्नः आत्मस्वभावः ।।४९।।
गंथहं इत्यादि गंथहँ उप्परि ग्रन्थस्य बाह्याभ्यन्तरपरिग्रहस्योपरि अथवा ग्रन्थ
रचनारूपशास्त्रस्योपरि परम-मुणि परमतपस्वी देसु वि करइ ण द्वेषमपि न करोति न राउ
ഹവേ, ബാഹ്യ-അഭ്യംതര പരിഗ്രഹനീ ഇച്ഛാ, പാംച ഇന്ദ്രിയോനാ വിഷയോനേ ഭോഗവവാനീ ആകാംക്ഷാ,
ദേഹനീ മൂര്ച്ഛാ അനേ വ്രതാദിനാ സംകല്പ-വികല്പഥീ രഹിത ഏവാ നിജ ശുദ്ധാത്മാനാ ധ്യാന വഡേ ജേ കോഈ
നിജ ശുദ്ധാത്മാനേ ജാണേ ഛേ തേ പരിഗ്രഹ, വിഷയോ, ദേഹ അനേ വ്രത-അവ്രതമാം രാഗ-ദ്വേഷ കരതോ നഥീ, ഏമ
ചാര സൂത്രോഥീ പ്രഗട കരേ ഛേ :
ഭാവാര്ഥ:മിഥ്യാത്വ, സ്ത്രീആദിനേ വേദവാനീ ആകാംക്ഷാരൂപ ത്രണവേദ, ഹാസ്യ, അരതി, രതി,
ശോക, ഭയ, ജുഗുപ്സാരൂപ ഛ നോകഷായ അനേ ക്രോധ, മാന, മായാ, ലോഭരൂപ ചാര കഷായ ഏ ചൌദ
आगे बाह्य अंतरंग परिग्रहकी इच्छासे पाँच इंद्रियोंके विषयभोगोंकी वांछासे रहित हुआ
देहमें ममता नहीं करता, तथा मिथ्यात्व अव्रत आदि समस्त संकल्प-विकल्पोंसे रहित जो निज
शुद्धात्मा उसे जानता है, वह परिग्रहमें तथा विषय देहसंबंधी व्रत-अव्रतमें राग-द्वेष नहीं करता,
ऐसा चार
सूत्रोंसे प्रगट करते हैं
गाथा४९
अन्वयार्थ :[ग्रंथस्य उपरि ] अंतरङ्ग बाह्य परिग्रहके ऊ पर अथवा शास्त्रके ऊ पर
जो [परममुनिः ] परम तपस्वी [रागम् द्वेषमपि न करोति ] राग और द्वेष नहीं करता है [येन ]
जिस मुनिने [आत्मस्वभावः ] आत्माका स्वभाव [ग्रंथात् ] ग्रंथसे [भिन्नः विज्ञातः ] जुदा जान
लिया है
भावार्थ :मिथ्यात्व, वेद, राग, द्वेष, हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा,
क्रोध, मान, माया, लोभये चौदह अंतरङ्ग परिग्रह और क्षेत्र, वास्तु (घर), हिरण्य,