Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ശ്രീ ദിഗംബര ജൈന സ്വാധ്യായമംദിര ട്രസ്ട, സോനഗഢ - ൩൬൪൨൫൦
विवेकमूढत्वं भवति । मइ-मोहेण य पावं मतिमूढत्वेन पापं भवति, ता पुण्णं अम्ह मा होउ
तस्मादित्थंभूतं पुण्यं अस्माकं मा भूदिति । तथा च । इदं पूर्वोक्तं पुण्यं भेदाभेदरत्नत्रया-
राधनारहितेन द्रष्टश्रुतानुभूतभोगाकांक्षारूपनिदानबन्धपरिणामसहितेन जीवेन यदुपार्जितं पूर्वभवे
तदेव मदमहंकारं जनयति बुद्धिविनाशं च करोति । न च पुनः सम्यक्त्वादिगुणसहितं भरत-
सगररामपाण्डवादिपुण्यबन्धवत् । यदि पुनः सर्वेषां मदं जनयति तर्हि ते कथं पुण्यभाजनाः
सन्तो मदाहंकारादिविकल्पं त्यक्त्वा मोक्षं गताः इति भावार्थः । तथा चोक्तं चिरन्तनानां
निरहंकारत्वम् — ‘‘सत्यं वाचि मतौ श्रुतं हृदि दया शौर्यं भुजे विक्रमे लक्ष्मीर्दान-
मनूनमर्थिनिचये मार्गे गतिर्निवृत्तेः । येषां प्रागजनीह तेऽपि निरहंकाराः श्रुतेर्गोचराश्चित्रं संप्रति
അധികാര-൨ : ദോഹാ-൬൦ ]പരമാത്മപ്രകാശ: [ ൩൧൯
उपार्जन किये भोगोंकी वाँछारूप पुण्य उसके फ लसे प्राप्त हुई घरमें सम्पदा होनेसे अभिमान
(घमंड) होता है, अभिमानसे बुद्धि भ्रष्ट होती है, बुद्धि भ्रष्टकर पाप कमाता है, और पापसे
भव भवमें अनंत दुःख पाता है । इसलिये मिथ्यादृष्टियोंका पुण्य-पापका ही कारण है । जो
सम्यक्त्वादि गुण सहित भरत, सगर, राम पांडवादिक विवेकी जीव हैं, उनको पुण्यबंध
अभिमान नहीं उत्पन्न करता, परम्पराय मोक्षका कारण है । जैसे अज्ञानीयोंके पुण्यका फ ल
विभूति गर्वका कारण है, वैसे सम्यग्दृष्टियोंके नहीं है । वे सम्यग्दृष्टि पुण्यके पात्र हुए चक्रवर्ती
आदिकी विभूति पाकर मद अहंकारादि विकल्पोंको छोड़कर मोक्षको गये अर्थात् सम्यग्दृष्टिजीव
चक्रवर्ती बलभद्र – पदमें भी निरहंकार रहे । ऐसा ही कथन आत्मानुशासन ग्रंथमें
श्रीगुणभद्राचार्यने किया है, कि पहले समयमें ऐसे सत्पुरुष हो गये हैं, कि जिनके वचनमें सत्य,
बुद्धिमें शास्त्र, मनमें दया, पराक्रमरूप भुजाओंमें शूरवीरता, याचकोंमें पूर्ण लक्ष्मीका दान, और
मोक्षमार्गमें गमन है, वे निरभिमानी हुए, जिनके किसी गुणका अहंकार नहीं हुआ । उनके नाम
शास्त्रोंमें प्रसिद्ध हैं, परंतु अब बड़ा अचंभा है, कि इस पंचमकालमें लेशमात्र भी गुण नहीं
പൂര്വോക്ത പുണ്യ ഉപാര്ജ്യും ഛേ തേ ജ പുണ്യ അഹംകാര ഉത്പന്ന കരേ ഛേ അനേ ബുദ്ധിനോ വിനാശ കരേ ഛേ,
പണ ഭരത, സഗര, രാമ, പാംഡവാദിനാ പുണ്യബംധനീ മാഫക സമ്യക്ത്വാദി ഗുണ സഹിത പുണ്യബംധ മദ
ഉത്പന്ന കരതോ നഥീ. വളീ ജോ പുണ്യ സര്വനേ മദ ഉത്പന്ന കരേ തോ തേഓ കേവീ രീതേ പുണ്യനാ ഭാജന
ഥതാം മദഅഹംകാരാദി വികല്പനേ ഛോഡീനേ മോക്ഷേ ഗയാ? ഏവോ ഭാവാര്ഥ ഛേ.
പഹേലാംനാ സമയമാം ഥഈ ഗയേലാ സത്പുരുഷോനേ നിരഹംകാരപണും പണ ആ പ്രമാണേ കഹ്യും ഛേ
കേ : — ‘‘सत्यं वाचि मतौ श्रुतं हृदि दया शौर्यं भुजे विक्रमे लक्ष्मीर्दानमनूनमर्थिनिचये मार्गे
गतिर्निवृत्तेः । येषां प्रागजनीह तेऽपि निरहंकाराः श्रुतेर्गोचराश्चित्रं संप्रति लेशतोऽपि न गुणास्तेषां
तथाप्युद्धताः ।।’’ (ആത്മാനുശാസന ൨൧൮) (അര്ഥ: — പഹേലാനാ സമയമാം ഏവാ സത്പുരുഷോ ഥഈ
ഗയാ ഛേ കേ വാണീമാം സത്യ, ബുദ്ധിമാം ആഗമ, ഹൃദയമാം ദയാ, ശൌര്യ, ഭുജാഓമാം പരാക്രമ