Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ശ്രീ ദിഗംബര ജൈന സ്വാധ്യായമംദിര ട്രസ്ട, സോനഗഢ - ൩൬൪൨൫൦
अज्जउ आर्यः । किं नामा । सन्ति शान्तिः भणेइ भणति कथयति इति । तथाहि ।
सम्यक्त्वपूर्वकदेवशास्त्रगुरुभक्त्या मुख्यवृत्त्या पुण्यमेव भवति न च मोक्षः । अत्राह प्रभाकरभट्टः ।
यदि पुण्यं मुख्यवृत्त्या मोक्षकारणं न भवत्युपादेयं च न भवति तर्हि भरतसगररामपाण्डवादयोऽपि
निरन्तरं पञ्चपरमेष्ठिगुणस्मरणदानपूजादिना निर्भरभक्त ाः सन्तः किमर्थं पुण्योपार्जनं कुर्युरिति ।
भगवानाह । यथा कोऽपि रामदेवादिपुरुषविशेषो देशान्तरस्थितसीतादिस्त्रीसमीपागतानां पुरुषाणां
तदर्थं संभाषणदानसन्मानादिकं करोति तथा तेऽपि महापुरुषाः वीतरागपरमानन्दैकरूप-
അധികാര-൨ : ദോഹാ-൬൧ ]പരമാത്മപ്രകാശ: [ ൩൨൧
पुण्य ही होता है, और परम्पराय मोक्ष होता है । जो सम्यक्त्व रहित मिथ्यादृष्टि हैं, उनके भाव
-भक्ति तो नहीं है, लौकिक बाह्य भक्ति होती है, उससे पुण्यका ही बंध है, कर्मका क्षय नहीं
है । ऐसा कथन सुनकर श्रीयोगीन्द्रदेवसे प्रभाकरभट्टने प्रश्न किया । हे प्रभो, जो पुण्य मुख्यतासे
मोक्षका कारण नहीं है, तो त्यागने योग्य ही है, ग्रहण योग्य नहीं है । जो ग्रहण योग्य नहीं
है, तो भरत, सगर, राम, पांडवादिक महान् पुरुषोंने निरंतर पंचपरमेष्ठीके गुणस्मरण क्यों किये ?
और दान-पूजादि शुभ क्रियाओंसे पूर्ण होकर क्यों पुण्यका उपार्जन किया ? तब श्रीगुरुने उत्तर
दिया — कि जैसे परदेशमें स्थित कोई रामादिक पुरुष अपनी प्यारी सीता आदि स्त्रीके पाससे
आये हुए किसी मनुष्यसे बातें करता है — उसका सम्मान करता है, और दान करता है, ये
सब कारण अपनी प्रियाके हैं, कुछ उसके प्रसादके कारण नहीं है । उसी तरह वे भरत, सगर,
राम, पांडवादि महान् पुरुष वीतराग परमानंदरूप मोक्षसे लक्ष्मीके सुख अमृत – रसके प्यासे हुए
संसारकी स्थितिके छेदनके लिये विषय कषायकर उत्पन्न हुए आर्त रौद्र खोटे ध्यानोंके नाशका
कारण श्रीपंचपरमेष्ठीके गुणोंका स्मरण करते हैं, और दान पूजादिक करते हैं, परंतु उनकी दृष्टि
केवल निज परिणतिपर है, पर वस्तुपर नहीं है । पंचपरमेष्ठीकी भक्ति आदि शुभ क्रियाको
परिणत हुए तो भरत आदिक हैं, उनके बिना चाहे पुण्यप्रकृतिका आस्रव होता है । जैसे
ഏവും കഥന സാംഭളീനേ പ്രഭാകരഭട്ട പൂഛേ ഛേ കേ ജോ പുണ്യ മുഖ്യപണേ മോക്ഷനും കാരണ നഥീ
അനേ ഉപാദേയ നഥീ തോ പഛീ ഭരത, സഗര, രാമ, പാംഡവാദി പണ നിരംതര പംചപരമേഷ്ഠീനാം ഗുണ,
സ്മരണ, ദാന, പൂജാദിഥീ നിര്ഭര (അത്യംത) ഭക്ത ഥഈനേ ശാ മാടേ പുണ്യ ഉപാര്ജന കരതാ ഹതാ?
ഭഗവാന ശ്രീയോഗീന്ദ്രദേവ കഹേ ഛേ കേ — ജേവീ രീതേ കോഈ രാമദേവാദി പുരുഷവിശേഷ
ദേശാംതരമാം രഹേല സീതാദിസ്ത്രീനീ പാസേഥീ ആവേല പുരുഷോനാം സീതാദി അര്ഥേ സംഭാഷണ, ദാന,
സന്മാനാദിക കരേ ഛേ തേവീ രീതേ തേ മഹാപുരുഷോ പണ വീതരാഗ പരമാനംദ ജ ജേനും ഏക രൂപ
ഛേ ഏവാ മോക്ഷലക്ഷ്മീനാ സുഖസുധാരസനാ പിപാസു ഥഈനേ സംസാരസ്ഥിതിനേ ഛേദവാനേ കാരണഭൂത അനേ
വിഷയകഷായഥീ ഉത്പന്ന ദുര്ധ്യാനനാ വിനാശനാ ഹേതുഭൂത ഏവാ, പരമേഷ്ഠീനാ ഗുണസ്മരണ, ദാന,
പൂജാദിക കരതാ ഹതാ.