Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ശ്രീ ദിഗംബര ജൈന സ്വാധ്യായമംദിര ട്രസ്ട, സോനഗഢ - ൩൬൪൨൫൦
अथ —
१९३) वंदउ णिंदउ पडिकमउ भाउ असुद्धउ जासु ।
पर तसु संजमु अत्थि णवि जं मण-सुद्धि ण तासु ।।६६।।
वन्दतां निन्दतु प्रतिक्रामतु भावः अशुद्धो यस्य ।
परं तस्य संयमोऽस्ति नैव यस्मात् मनः शुद्धिर्न तस्य ।।६६।।
वंदउ इत्यादि । वंदउ णिंदउ पडिकमउ वन्दननिन्दनप्रतिक्रमणं करोतु । भाउ असुद्धउ
जासु भावः परिणामः न शुद्धो यस्य, पर परं नियमेन तसु तस्य पुरुषस्य संजमु अत्थि णवि
संयमोऽस्ति नैव । कस्मान्नास्ति । जं यस्मात् कारणात् मण-सुद्धि ण तासु मनःशुद्धिर्न तस्येति ।
तद्यथा । नित्यानन्दैकरूपस्वशुद्धात्मानुभूतिप्रतिपक्षैर्विषयकषायाधीनैः ख्यातिपूजालाभादिमनोरथ-
शतसहस्रविकल्पजालमालाप्रपञ्चोत्पन्नैरपध्यानैर्यस्य चित्तं रञ्चितं वासितं तिष्ठति तस्य द्रव्यरूपं
൩൨൮ ]യോഗീന്ദുദേവവിരചിത: [ അധികാര-൨ : ദോഹാ-൬൬
आगे इसी बातको दृढ़ करते हैं —
गाथा – ६६
अन्वयार्थ : — [वंदतु निंदतु प्रतिक्रामतु ] निःशंक वंदना करो, निंदा करो,
प्रतिक्रमणादि करो, लेकिन [यस्य ] जिसके [अशुद्धो भावः ] जब तक अशुद्ध परिणाम हैं,
[तस्य ] उसके [परं ] नियमसे [संयमः ] संयम [नैव अस्ति ] नहीं हो सकता, [यस्मात् ]
क्योंकि [तस्य ] उसके [मनःशुद्धिः न ] मनकी शुद्धता नहीं है । जिसका मन शुद्ध नहीं, उसके
संयम कहाँसे हो सकता है ?
भावार्थ : — नित्यानंद एकरूप निज शुद्धात्माकी अनुभूतिके प्रतिपक्षी (उलटे) जो
विषय कषाय, उनके आधीन आर्त रौद्र खोटे ध्यानोंकर जिसका चित्त रँगा हुआ है, उसके
द्रव्यरूप व्यवहार – वंदना, निंदा प्रतिक्रमणादि क्या कर सकते हैं ? जो वह बाह्य – क्रिया करता
है, तो भी उसके भावसंयम नहीं है । सिद्धान्तमें उसे असंयमी कहते हैं । कैसे हैं, वो आर्त
रौद्र स्वरूप खोटे ध्यान अपनी बड़ाई, प्रतिष्ठा और लाभादि सैंकड़ों मनोरथोंके विकल्पोंकी
मालाके (पंक्तिके) प्रपंच कर उत्पन्न हुए हैं । जब तक ये चित्तमें हैं, तब तक बाह्य – क्रिया
ഹവേ, ഏ ജ വാതനേ ദ്രഢ കരേ ഛേ : —
ഭാവാര്ഥ: — നിത്യാനംദ ജ ജേനും ഏക രൂപ ഛേ ഏവാ ശുദ്ധ ആത്മാനീ അനുഭൂതിഥീ പ്രതിപക്ഷീ
വിഷയകഷായനേ ആധീന, ഖ്യാതി-പൂജാ-ലാഭാദിനാ ലാഖോ മനോരഥനീ വികല്പജാളനീ മാളാനാ പ്രപംചഥീ
ഉത്പന്ന ഏവാം അപധ്യാന (മാഠാം ധ്യാന)ഥീ ജേനും ചിത്ത രംജിത (രംഗായേലും) രഹേ ഛേ, വാസിത രഹേ ഛേ