Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ശ്രീ ദിഗംബര ജൈന സ്വാധ്യായമംദിര ട്രസ്ട, സോനഗഢ - ൩൬൪൨൫൦
൩൩൬ ]യോഗീന്ദുദേവവിരചിത: [ അധികാര-൨ : ദോഹാ-൭൦
मोक्षके इच्छुकको वही भाव हमेशा करना चाहिये ।।६९।।
आगे यह प्रकट करते हैं, कि किसी देशमें जावो, चाहे जो तप करो, तो भी चित्तकी
शुद्धिके बिना मोक्ष नहीं है —
गाथा – ७०
अन्वयार्थ : — [जीव ] हे जीव, [यत्र ] जहाँ [भाति ] तेरी इच्छा ही [तत्र ] उसी
देशमें [याहि ] जा, और [यत् ] जो [भाति ] अच्छा लगे, [तदेव ] वही [कुरु ] कर, [परं ]
लेकिन [यदेव ] जब तक [चित्तस्य शुद्धिः न ] मनकी शुद्धि नहीं है, तब तक [कथमपि ]
किसी तरह [मोक्षो नास्ति ] मोक्ष नहीं हो सकता ।
भावार्थ : — बड़ाई, प्रतिष्ठा, परवस्तुका लाभ, और देखे, सुने, भोगे हुए भोगोंकी
वाँछारूप खोटे ध्यान, (जो कि शुद्धात्मज्ञानके शत्रु हैं) इनसे जब तक यह चित्त रँगा हुआ
അഹീം, ജേ കാരണഥീ നിജശുദ്ധാത്മാനാ അനുഭൂതിരൂപ പരിണാമ ജ മോക്ഷമാര്ഗ ഛേ തേ കാരണഥീ
മോക്ഷാര്ഥീഏ തേ ജ ഭാവ നിരംതര കരവാ യോഗ്യ ഛേ, ഏവോ താത്പര്യാര്ഥ ഛേ. ൬൯.
ഹവേ, കോഈ പണ ദേശമാം ജാഓ, കോഈ പണ അനുഷ്ഠാന കരോ, തോപണ ചിത്തശുദ്ധി വിനാ മോക്ഷ
നഥീ, ഏമ പ്രഗട കരേ ഛേ : —
ഭാവാര്ഥ: — ശുദ്ധാത്മാനീ അനുഭൂതിഥീ പ്രതിപക്ഷഭൂത അനേ ഖ്യാതി, പൂജാ, ലാഭനീ അനേ
ദേഖേലാ, സാംഭളേലാ അനേ അനുഭവേലാ ഭോഗോനീ ആകാംക്ഷാരൂപ ദുര്ധ്യാനഥീ ജ്യാം സുധീ ചിത്ത രംജിത
लभते किंतु नैव । अत्र येन कारणेन निजशुद्धात्मानुभूतिपरिणाम एव मोक्षमार्गस्तेन कारणेन
मोक्षार्थिना स एव । निरन्तरं कर्तव्य इति तात्पर्यार्थः ।।६९।।
अथ क्वापि देशे गच्छ किमप्यनुष्ठानं कुरु तथापि चित्तशुद्धिं विना मोक्षो नास्तीति
प्रकटयति —
१९७) जहिँ भावइ तहिँ जाहि जिय जं भावइ करि तं जि ।
केम्वइ मोक्खु ण अत्थि पर चित्तहँ सुद्धि ण जं जि ।।७०।।
अत्र भाति तत्र याहि जीव यद् भाति कुरु तदेव ।
कथमपि मोक्षः नास्ति परं चित्तस्य शुद्धिर्न यदेव ।।७०।।
जहिं भावइ इत्यादि । जहिं भावइ तहिं यत्र देशे प्रतिभाति तत्र जाहि गच्छ जिय
हे जीव । जं भावइ करि तं जि यदनुष्ठानं प्रतिभाति कुरु तदेव । केम्वइ मोक्खु ण अत्थि