Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ശ്രീ ദിഗംബര ജൈന സ്വാധ്യായമംദിര ട്രസ്ട, സോനഗഢ - ൩൬൪൨൫൦
അധികാര-൨ : ദോഹാ-൧൮൬ ]പരമാത്മപ്രകാശ: [ ൫൧൩
मया पुनर्द्रव्यादिकं मुक्त्वापि तेषां सुखं कृतमिति मत्वा रोषं त्यज । अथवा मदीया
अनन्तज्ञानादिगुणा न गृहीतास्तैः किंतु दोषा एव गृहीता इति मत्वा च कोपं त्यज, अथवा
ममैते दोषाः सन्ति सत्यमिदमस्य वचनं तथापि रोषं त्यज, अथवा ममैते दोषा न सन्ति
तस्य वचनेन किमहं दोषी जातस्तथापि, क्षमितव्यम्, अथवा परोक्षे दोषग्रहणं करोति न च
प्रत्यक्षे समीचीनोऽसौ तथापि क्षमितव्यम्, अथवा वचनमात्रेणैव दोषग्रहणं करोति न च
शरीरबाधां करोति तथापि क्षमितव्यम्, अथवा शरीरबाधामेव करोति न च प्राणविनाशं
അഥവാ മാരാ അനംതജ്ഞാനാദി ഗുണോ തോ തേമണേ ലീധാ നഥീ, പരംതു മാരാ ദോഷോ ജ ഗ്രഹ്യാ ഛേ
ഏമ മാനീനേ പണ കോപ ഛോഡ, അഥവാ ആ ദോഷോ മാരാമാം ഛേ ഏവും ഏനും വചന സത്യ ഛേ,
ഏമ മാനീനേ രോഷ ത്യജ അഥവാ ആ ദോഷോ മാരാമാം നഥീ തോ തേനാ വചനഥീ ശും ഹും ദോഷീ
ഥഈ ഗയോ? ഏമ മാനീനേ ക്ഷമാ കരവീ, അഥവാ മാരാ ദോഷ പീഠ പാഛള കഹേ ഛേ, പണ മാരീ
സമക്ഷ നഥീ കഹേതോ തേ സമീചീന ഛേ (സാരും ഛേ) ഏമ മാനീനേ ക്ഷമാ കരവീ, അഥവാ (കോഈ
പ്രത്യക്ഷ പോതാനീ സാമേ ദോഷ കഹേ തോ) വചനമാത്രഥീ മാരാ ദോഷ ഗ്രഹണ കരേ ഛേ പണ മാരാ
ശരീരനേ ബാധാ കരതോ നഥീ ഏമ മാനീനേ ക്ഷമാ കരവീ, അഥവാ ശരീരനേ ജ ബാധാ കരേ ഛേ,
പ്രാണനോ വിനാശ കരതോ നഥീ ഏമ മാനീനേ ക്ഷമാ കരവീ, അഥവാ പ്രാണനോ ജ വിനാശ കരേ ഛേ
जानकर हे भव्य, तू रोष छोड़ । अथवा ऐसा विचारे, कि मेरे अनंत ज्ञानादि गुण तो उसने
नहीं लिये, दोष लिये वो निस्संक लो । जैसे घरमें कोई चोर आया, और उसने रत्न
सुवर्णादि नहीं लिये माटी पत्थर लिये तो लो, तुच्छ वस्तुके लेनेवाले पर क्या क्रोध करना,
ऐसा जान रोष छोड़ना । अथवा ऐसा विचारे, कि जो यह दोष कहता है, वे सच कहता
है, तो सत्यवादीसे क्या द्वेष करना । अथवा ये दोष मुझमें नहीं हुआ वह वृथा कहता है,
तो उसके वृथा कहनेसे क्या मैं दोषी हो गया, बिलकुल नहीं हुआ । ऐसा जानकर क्रोध
छोड़ क्षमाभाव धारण करना चाहिये । अथवा यह विचारो कि वह मेरे मुँहके आगे नहीं
कहता, लेकिन पीठ पीछे कहता है, सो पीठ पीछे तो राजाओंको भी बुरा कहते हैं, ऐसा
जानकर उससे क्षमा करना कि प्रत्यक्ष तो मेरा मानभंग नहीं करता है, परोक्षकी बात क्या
है । अथवा कदाचित् कोई प्रत्यक्ष मुँह आगे दोष कहे, तो तू यह विचार की वचनमात्रसे
मेरे दोष ग्रहण करता है, शरीरको तो बाधा नहीं करता, यह गुण है, ऐसा जान क्षमा ही
कर । अथवा जो कोई शरीरको भी बाधा करे, तो तू ऐसा विचार, कि मेरे प्राण तो नहीं
हरता, यह गुण है । जो कभी कोई पापी प्राण ही हर ले, तो यह विचार कि ये प्राण तो
विनाशक हैं, विनाशीक वस्तुके चले जानेकी क्या बात है । मेरा ज्ञानभाव अविनश्वर है,
उसको तो कोई हर नहीं सकता, इसने तो मेरे बाह्य प्राण हर लिये हैं; परंतु