Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Malayalam transliteration). Gatha-187 (Adhikar 2) Bathi Chintaono Nishedh.

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ശ്രീ ദിഗംബര ജൈന സ്വാധ്യായമംദിര ട്രസ്ട, സോനഗഢ - ൩൬൪൨൫൦
൫൧൪ ]യോഗീന്ദുദേവവിരചിത: [ അധികാര-൨ : ദോഹാ-൧൮൭
तथापि क्षमितव्यम्, अथवा प्राणविनाशमेव करोति न च भेदाभेदरत्नत्रयभावनाविनाशं चेति
मत्वा सर्वतात्पर्येण क्षमा कर्तव्येत्यभिप्रायः
।।१८६।।
अथ सर्वचिन्तां निषेधयति युग्मेन
३१८) जोइय चिंति म किं पि तुहुँ जइ बीहउ दुक्खस्स
तिल-तुस-मित्तु वि सल्लडा वेयण करइ अवस्स ।।१८७।।
योगिन् चिन्तय मा किमपि त्वं यदि भीतः दुःखस्य
तिलतुषमात्रमपि शल्यं वेदनां करोत्यवश्यम् ।।१८७।।
चिंति म चिन्तां मा कार्षीः किं पि तुहुं कामपि त्वं जोइय हे योगिन् यदि किम्
जइ बीहउ यदि बिभेषि कस्य दुक्खस्स वीतरागतात्त्विकानन्दैकरूपात् पारमार्थिक-
പണ ഭേദാഭേദ രത്നത്രയ ഭാവനാനോ വിനാശ കരതോ നഥീ ഏമ മാനീനേ സര്വ താത്പര്യഥീ ക്ഷമാ
കരവീ ജോഈഏ, ഏ അഭിപ്രായ ഛേ. ൧൮൬.
ഹവേ, ബേ ഗാഥാസൂത്രോ ദ്വാരാ സര്വ ചിംതാഓനോ നിഷേധ കരേ ഛേ :
ഭാവാര്ഥ :ഹേ യോഗീ! തും ജോ വീതരാഗ താത്ത്വിക ആനംദമയ ജേനും ഏകരൂപ ഛേ ഏവാ
പാരമാര്ഥിക സുഖഥീ പ്രതിപക്ഷഭൂത നാരകാദി ദുഃഖഥീ ഡരതോ ഹോ തോ വിഷയകഷായനീ ലേശ മാത്ര പണ
भेदाभेदरत्नत्रयकी भावनाका विनाश नहीं किया ऐसा जानकर सर्वथा क्षमा ही करना
चाहिये ।।१८६।।
आगे सब चिन्ताओंका निषेध करते हैं
गाथा१८७
अन्वयार्थ :[योगिन् ] हे योगी, [त्वं ] तू [यदि ] जो [दुःखस्य ] वीतराग परम
आनंदके शत्रु जो नरकादि चारों गतियोंके दुःख उनसे [भीतः ] डर गया है, तो तू निश्चिंत
होकर परलोकका साधन कर, इस लोककी [किमपि मा चिंतय ] कुछ भी चिंता मत कर
क्योंकि [तिलतुषमात्रमपि शल्यं ] तिलके भूसे मात्र भी शल्य [वेदनां ] मनको वेदना
[अवश्यम् करोति ] निश्चयसे करती है
भावार्थ :चिन्ता रहित आत्मज्ञानसे उलटे जो विषय कषाय आदि विकल्पजाल
उनकी चिन्ता कुछ भी नहीं करना यह चिन्ता दुःखका ही कारण है, जैसे बाण आदिकी