Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Malayalam transliteration). Gatha-213 (Adhikar 2) Paramatmaprakash Shastranu Phal.

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ശ്രീ ദിഗംബര ജൈന സ്വാധ്യായമംദിര ട്രസ്ട, സോനഗഢ - ൩൬൪൨൫൦
അധികാര-൨ : ദോഹാ-൨൧൩ ]പരമാത്മപ്രകാശ: [ ൫൪൯
अथैकवृत्तेन प्रोत्साहनार्थं पुनरपि फ लं दर्शयति
३४४) जं तत्तं णाणरूवं परममुणिगणा णिच्च झायंति चित्ते
जं तत्तं देहचत्तं णिवसइ भुवणे सव्व-देहीण देहे
जं तत्तं दिव्व-देहं तिहुविणगुरुगं सिज्झए संतजीवे
जं तत्तं जस्स सुद्धं फु रइ णियमणे पावए सो हि सिद्धिं ।।२१३।।
यत् तत्त्वं ज्ञानरूपं परममुनिगणा नित्यं ध्यायन्ति चित्ते
यत् तत्त्वं देहत्यक्तं निवसति भुवने सर्वदेहिनां देहे
यत् तत्त्वं दिव्यदेहं त्रिभुवनगुरुकं सिध्यति शान्तजीवे
तत् तत्त्वं यस्य शुद्धं स्फु रति निजमनसि प्राप्नोति स हि सिद्धिम्
।।२१३।।
पावए सो प्राप्नोति स हि स्फु टम् काम् सिद्धिं मुक्ति म् यस्य किम् जस्स
അന്തരസ്ഥളോഥീ ചോവീസ സൂത്രോനും മഹാസ്ഥള സമാപ്ത ഥയും.
ഹവേ, ഏക സ്രഗ്ധരാ നാമനാ ഛംദഥീ പ്രോത്സാഹന അര്ഥേ ഫരീനേ പണ (ആ ഗ്രംഥനേ ഭണവാനും) ഫള
കഹേ ഛേ :
ഭാവാര്ഥ :ജേ ആത്മതത്ത്വ ജ്ഞാനരൂപ ഛേ, ജേനും പരമമുനിഗണോ ചിത്തമാം നിരംതര ധ്യാന
महास्थल पूर्ण हुआ
आगे एक स्रग्धरा नामके छंदमें फि र भी इस ग्रंथके पढ़नेका फ ल कहते हैं
गाथा२१३
अन्वयार्थ :[तत् ] वह [तत्त्वं ] निज आत्मतत्त्व [यस्य निजमनसि ] जिसके
मनमें [स्फु रति ] प्रकाशमान हो जाता है, [स हि ] वह ही साधु [सिद्धिम् प्राप्नोति ] सिद्धिको
पाता है
कैसा है, वह तत्त्व ? जो कि [शुद्धं ] रागादि मल रहित है, [ज्ञानरूपं ] और ज्ञानरूप
है, जिसको [परममुनिगणाः ] परममुनीश्वर [नित्यं ] सदा [चित्ते ध्यायंति ] अपने चित्तमें ध्याते
हैं, [यत् तत्त्वं ] जो तत्त्व [भुवने ] इस लोकमें [सर्वदेहिनां देहे ] सब प्राणियोंके शरीरमें
[निवसति ] मौजूद है, [देहत्यक्तं ] और आप देहसे रहित है, [यत् तत्त्वं ] जो तत्त्व [दिव्यदेहं ]
केवलज्ञान और आनदरूप अनुपम देहको धारण करता है, [त्रिभुवनगुरुकं ] तीन भुवनमें श्रेष्ठ
है, [शांतजीवे सिध्यति ] जिसको आराधकर शांतपरिणामी संतपुरुष सिद्धपद पाते हैं
भावार्थ :ऐसा वह चैतन्यतत्त्व जिसके चित्तमें प्रगट हुआ है, वही साधु सिद्धिको