Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration). Gatha-61 (Adhikar 1).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
वीतरागचिदानन्दैकस्वभावोऽपि पश्चाद्वयवहारेण वीतरागनिर्विकल्पस्वसंवेदनाभावेनोपार्जितं शुभाशुभं
कर्म हेतुं लब्ध्वा पुण्यरूपः पापरूपश्च भवति
अत्र यद्यपि व्यवहारेण पुण्यपापरूपो भवति तथापि
परमात्मानुभूत्यविनाभूतवीतरागसम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रबहिर्द्रव्येच्छानिरोधलक्षणतपश्चरणरूपा या तु
निश्चयचतुर्विधाराधना तस्या भावनाकाले साक्षादुपादेयभूतवीतरागपरमानन्दैकरूपो
मोक्षसुखाभिन्नत्वात् शुद्धजीव उपादेय इति तात्पर्यार्थः
।।६०।।
अथ तानि पुनः कर्माण्यष्टौ भवन्तीति कथयति
६१) ते पुणु जीवहँ जोइया अट्ठ वि कम्म हवंति
जेहिँ जि झंपिय जीव णवि अप्प-सहाउ लहंति ।।६१।।
तानि पुनः जीवानां योगिन् अष्टौ अपि कर्माणि भवन्ति
यैः एव झंपिताः जीवाः नैव आत्मस्वभावं लभन्ते ।।६१।।
ते पुणु जीवहं जोइया अट्ठ वि कम्म हवंति तानि पुनर्जीवानां हे योगिन्नष्टावेव
कर्माणि भवन्ति जेहिं जि झंपिय जीव णवि अप्पसहाउ लहंति यैरेव कर्मभिर्झपिताः जीवा
हैं, उनकी भावनाके समय साक्षात् उपादेयरूप वीतराग परमानन्द जो मोक्षका सुख उससे
अभिन्न आनंदमयी ऐसा निज शुद्धात्मा ही उपादेय है, अन्य सब हेय हैं
।।६०।।
आगे कहते हैं, वे कर्म आठ हैं, जिनसे संसारी जीव बँधे हैं, कहतेश्रीगुरु अपने
शिष्य मुनिसे कहते हैं, कि
गाथा६१
अन्वयार्थ :[योगिन् ] हे योगी, [तानि पुनः कर्माणि ] वे फि र कर्म [जीवानां
अष्टौ अपि ] जीवोंके आठ ही [भवन्ति ] होते हैं, [यैः एव झंपिताः ] जिन कर्मोंसे ही
आच्छादित (ढँके हुए) [जीवाः ] ये जीवकर [आत्मस्वभावं ] अपने सम्यक्त्वादि आठ गुणरूप
स्वभावको [नैव लभन्ते ] नहीं पाते
ନିରୋଧ ଜେନୁଂ ଲକ୍ଷଣ ଛେ, ଏଵା ତପଶ୍ଚରଣରୂପ ଜେ ଚାର ପ୍ରକାରନୀ ନିଶ୍ଚଯ-ଆରାଧନା ଛେ ତେନୀ ଭାଵନାନା
ସମଯେ ସାକ୍ଷାତ୍ ଉପାଦେଯଭୂତ ଵୀତରାଗ ପରମାନଂଦ ଜେନୁଂ ଏକ ରୂପ ଛେ ଏଵୋ ଶୁଦ୍ଧ ଜୀଵ ମୋକ୍ଷସୁଖଥୀ
ଅଭିନ୍ନ ହୋଵାଥୀ ଉପାଦେଯ ଛେ, ଏଵୋ ତାତ୍ପର୍ଯାର୍ଥ ଛେ. ୬୦.
ହଵେ ତେ କର୍ମୋ ଆଠ ଛେ ଏମ କହେ ଛେ :
ଭାଵାର୍ଥ :ଜ୍ଞାନାଵରଣାଦି ଭେଦଥୀ କର୍ମୋ ଆଠ ଜ ଛେ କେ ଜେନାଥୀ ଆଚ୍ଛାଦିତ ଥଯେଲା ଜୀଵୋ
ଅଧିକାର-୧ : ଦୋହା-୬୧ ]ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ: [ ୧୦୭