Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
मवगाहनत्वं भण्यते एकान्तेन गुरुलघुत्वस्याभावरूपेण अगुरुलघुत्वं भण्यते वेदनीयकर्मोदय-
जनितसमस्तबाधारहितत्वादव्याबाधगुणश्चेति इदं सम्यक्त्वादिगुणाष्टकं संसारावस्थायां किमपि
केनापि कर्मणा प्रच्छादितं तिष्ठति यथा तथा कथ्यते सम्यक्त्वं मिथ्यात्वकर्मणा प्रच्छादितं,
केवलज्ञानं केवलज्ञानावरणेन झंपितं, केवलदर्शनं केवलदर्शनावरणेन झंपितम्, अनन्तवीर्यं
वीर्यान्तरायेण प्रच्छादितं, सूक्ष्मत्वमायुष्ककर्मणा प्रच्छादितम्
कस्मादिति चेत् विवक्षितायुः
कर्मोदयेन भवान्तरे प्राप्ते सत्यतीन्द्रियज्ञानविषयं सूक्ष्मत्वं त्यक्त्वा पश्चादिन्द्रियज्ञानविषयो
भवतीत्यर्थः
अवगाहनत्वं शरीरनामकर्मोदयेन प्रच्छादितं, सिद्धावस्थायोग्यं विशिष्टागुरुलघुत्वं
नामकर्मोदयेन प्रच्छादितम् गुरुत्वशब्देनोच्चगोत्रजनितं महत्त्वं भण्यते, लघुत्वशब्देन
(୭) ସର୍ଵଥା ଗୁରୁଲଘୁତ୍ଵନା ଅଭାଵରୂପେ ଅଗୁରୁଲଘୁତ୍ଵ କହେଵାଯ ଛେ.
(୮) ଵେଦନୀଯ କର୍ମନା ଉଦଯଜନିତ ସମସ୍ତ ବାଧାଥୀ ରହିତ ହୋଵାଥୀ ଅଵ୍ଯାବାଧ ଗୁଣ କହେଵାଯ ଛେ.
ଆ ସମ୍ଯକ୍ତ୍ଵାଦି ଆଠ ଗୁଣୋ ସଂସାର-ଅଵସ୍ଥାମାଂ କଈ ରୀତେ କ୍ଯା କର୍ମଥୀ ଆଚ୍ଛାଦିତ ରହେ
ଛେ ତେ କହେ ଛେ :
ସମ୍ଯକ୍ତ୍ଵ ମିଥ୍ଯାତ୍ଵକର୍ମଥୀ ଆଚ୍ଛାଦିତ ଛେ. କେଵଳଜ୍ଞାନ କେଵଳଜ୍ଞାନାଵରଣଥୀ ଆଚ୍ଛାଦିତ
ଛେ. କେଵଳଦର୍ଶନ କେଵଳଦର୍ଶନାଵରଣଥୀ ଆଚ୍ଛାଦିତ ଛେ, ଅନଂତଵୀର୍ଯ ଵୀର୍ଯାନ୍ତରାଯଥୀ ଆଚ୍ଛାଦିତ ଛେ,
ସୂକ୍ଷ୍ମତ୍ଵ ଆଯୁକର୍ମଥୀ ଆଚ୍ଛାଦିତ ଛେ ଶାଥୀ? କେ ଵିଵକ୍ଷିତ ଆଯୁକର୍ମନା ଉଦଯଥୀ ବୀଜୋ ଭଵ
ପ୍ରାପ୍ତ ଥତାଂ, ଅତୀନ୍ଦ୍ରିଯଜ୍ଞାନନା ଵିଷଯରୂପ ସୂକ୍ଷ୍ମତ୍ଵନେ ଛୋଡୀନେ ପାଂଚ ଇନ୍ଦ୍ରିଯଜ୍ଞାନନା ଵିଷଯରୂପ ଥାଯ
ଛେ ଏଵୋ ଅର୍ଥ ଛେ. ଅଵଗାହନତ୍ଵ ଶରୀରନାମକର୍ମନା ଉଦଯଥୀ ଆଚ୍ଛାଦିତ ଛେ. ସିଦ୍ଧଅଵସ୍ଥାନେ
ଯୋଗ୍ଯ ଵିଶିଷ୍ଟ ଅଗୁରୁଲଘୁତ୍ଵନାମକର୍ମନା ଉଦଯଥୀ ଆଚ୍ଛାଦିତ ଛେ, ‘ଗୁରୁତ୍ଵ’ ଶବ୍ଦଥୀ
ଉଚ୍ଚଗୋତ୍ରଜନିତ ମହତ୍ଵ (ଉଚ୍ଚପଣୁଂ) କହେଵାମାଂ ଆଵେ ଛେ. ‘ଲଘୁତ୍ଵ’ ଶବ୍ଦଥୀ ନୀଚଗୋତ୍ରଜନିତ
देनेकी सामर्थ्य वह अवगाहनागुण है, सर्वथा गुरुता और लघुताका अभाव अर्थात् न गुरु न
लघु
उसे अगुरु-लघु कहते हैं, और वेदनीयकर्मके उदयके अभावसे उत्पन्न हुआ समस्त
बाधा रहित जो निराबाधगुण उसे अव्याबाध कहते हैं ये सम्यक्त्वादि आठ गुण जो सिद्धोंके
हैं, वे संसारावस्थामें किस किस कर्मसे ढँके हुए हैं, इसे कहते हैंसम्यक्त्व गुण मिथ्यात्वनाम
दर्शनमोहनीयकर्मसे आच्छादित है, केवलज्ञानावरणसे केवलज्ञान ढका हुआ है,
केवलदर्शनावरणसे केवलदर्शन ढका है, वीर्यान्तरायकर्मसे अनंतवीर्य ढका है, आयुःकर्मसे
सूक्ष्मत्वगुण ढका है, क्योंकि आयुकर्म उदयसे जब जीव परभवको जाता है, वहाँ इन्द्रियज्ञानका
धारक होता है, अतीन्द्रियज्ञानका अभाव होता है, इस कारण कुछ एक स्थूल वस्तुओंको तो
जानता है, सूक्ष्मको नहीं जानता, शरीरनामकर्मके उदयसे अवगाहनगुण आच्छादित है,
सिद्धावस्थाके योग्य विशेषरूप अगुरुलघुगुण नामकर्मके उदयसे अथवा गोत्रकर्मके उदयसे ढक
ଅଧିକାର-୧ : ଦୋହା-୬୧ ]ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ: [ ୧୦୯