Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration). Gatha-87 (Adhikar 1).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
ଅଧିକାର-୧ : ଦୋହା-୮୭ ]ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ: [ ୧୪୫
८७) अप्पा बंभणु वइसु ण वि ण वि खत्तिउ ण वि सेसु
पुरिसु णउंसउ इत्थि ण वि णाणिउ मुणइ असेसु ।।८७।।
आत्मा ब्राह्मणः वैश्यः नापि नापि क्षत्रियः नापि शेषः
पुरुषः नपुंसकः स्त्री नापि ज्ञानी मनुते अशेषम् ।।८७।।
अप्पा बंभणु वइसु ण वि ण वि खत्तिउ ण वि सेसु पुरिसु णउंसउ इत्थि ण वि आत्मा
ब्राह्मणो न भवति वैश्योऽपि नैव नापि क्षत्रियो नापि शेषः शूद्रादिः पुरुषनपुंसकस्त्रीलिङ्गरूपोऽपि
नैव
तर्हि किंविशिष्टः णाणिउ मुणइ असेसु ज्ञानी ज्ञानस्वरूप आत्मा ज्ञानी सन् किं करोति
मनुते जानाति कम् अशेषं वस्तुजातं वस्तुसमूहमिति तद्यथा यानेव ब्राह्मणादिवर्णभेदान्
पंुल्लिङ्गादिलिङ्गभेदान् व्यवहारेण परमात्मपदार्थादभिन्नान् शुद्धनिश्चयेन भिन्नान् साक्षाद्धेयभूतान्
वीतरागनिर्विकल्पसमाधिच्युतो बहिरात्मा स्वात्मनि योजयति तानेव तद्विपरीतभावनारतोऽन्तरात्मा
आगे ब्राह्मणादि वर्ण आत्माके नहीं हैं, ऐसा वर्णन करते हैं
गाथा८७
अन्वयार्थ :[आत्मा ] आत्मा [ब्राह्मणः वैश्यः नापि ] ब्राह्मण नहीं है, वैश्य नहीं
है, [क्षत्रियः नापि ] क्षत्री भी नहीं है, [शेषः ] बाकी शुद्र भी [नापि ] नहीं है, [पुरुषः
नपुंसकः स्त्री नापि ] पुरुष, नपुंसक, स्त्रीलिंगरूप भी नहीं है, [ज्ञानी ] ज्ञानस्वरूप हुआ
[अशेषम् ] समस्त वस्तुओंको ज्ञानसे [मनुते ] जानता है
भावार्थ :जो ब्राह्मणादि वर्ण-भेद हैं, और पुरुष लिंगादि तीन लिंग हैं, वे यद्यपि
व्यवहारनयकर देहके सम्बन्धसे जीवके कहे जाते हैं, तो भी शुद्धनिश्चयनयकर आत्मासे भिन्न
हैं, और साक्षात् त्यागने योग्य हैं, उनको वीतरागनिर्विकल्पसमाधिसे रहित मिथ्यादृष्टि जीव अपने
जानता है, और उन्हींको मिथ्यात्वसे रहित सम्यग्दृष्टि जीव अपने नहीं समझता
आपको तो
ହଵେ (ବ୍ରାହ୍ମଣାଦି ଵର୍ଣ ଆତ୍ମାନେ ନଥୀ ଏଵୁଂ ଵର୍ଣନ କରେ ଛେ) :
ଭାଵାର୍ଥ:ଵୀତରାଗନିର୍ଵିକଲ୍ପ ସମାଧିଥୀ ଚ୍ଯୁତ ଥଯେଲୋ ବହିରାତ୍ମା ଜେ ବ୍ରାହ୍ମଣାଦି
ଵର୍ଣଭେଦୋ, ପୁଲ୍ଲିଂଗାଦି ଲିଂଗଭେଦୋ ଵ୍ଯଵହାରଥୀ ପରମାର୍ଥପଦାର୍ଥଥୀ ଅଭିନ୍ନ ଛେ, ଶୁଦ୍ଧନିଶ୍ଚଯନଯଥୀ ଭିନ୍ନ
ଛେ ଅନେ ସାକ୍ଷାତ୍ ହେଯ ଛେ ତେମନେ ପୋତାନା ଆତ୍ମାମାଂ ଜୋଡେ ଛେ, ତେନାଥୀ ଵିପରୀତ ଭାଵନାମାଂ ରତ ଏଵୋ
ଅନ୍ତରାତ୍ମା ତେମନେ ସ୍ଵଶୁଦ୍ଧାତ୍ମସ୍ଵରୂପମାଂ ଯୋଜତୋ ନଥୀ. ଏ ତାତ୍ପଯାର୍ଥ ଛେ. ୮୭.