Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration). Gatha-95 (Adhikar 1).

< Previous Page   Next Page >


Page 156 of 565
PDF/HTML Page 170 of 579

background image
Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
୧୫୬ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୧ : ଦୋହା-୯୫
अत्रोक्त लक्षणेऽभेदरत्नत्रयपरिणतः परमात्मैवोपादेय इति भावार्थः ।।९४।।
अथ निश्चयेन वीतरागभावपरिणतः स्वशुद्धात्मैव निश्चयतीर्थः निश्चयगुरुर्निश्चयदेव इति
कथयति
९५) अण्णु जि तित्थु म जाहि जिय अण्णु जि गुरुउ म सेवि
अण्णु जि देउ म चिंति तुहुँ अप्पा विमलु मुएवि ।।९५।।
अन्यद् एव तीर्थ मा याहि जीव अन्यद् एव गुरुं मा सेवस्व
अन्यद् एव देवं मा चिन्तय त्वं आत्मानं विमलं मुक्त्वा ।।९५।।
अण्णु जि तित्थु म जाहि जिय अण्णु जि गुरुउ म सेवि अण्णु जि देउ म चिंति
तुहुं अन्यदेव तीर्थं मा गच्छ हे जीव अन्यदेव गुरुं मा सेवस्व अन्यदेव देवं मा चिन्तय त्वम्
निश्चयनयकर चारित्र है तात्पर्य यह है कि अभेदरूप परिणत हुआ परमात्मा ही ध्यान करने
योग्य है ।।९४।।
आगे निश्चयनयकर वीतरागभावरूप परिणत हुआ निज शुद्धात्मा ही निश्चयतीर्थ,
निश्चयगुरु, निश्चयदेव है, ऐसा कहते हैं
गाथा९५
अन्वयार्थ :[जीव ] हे जीव [त्वं ] तू [अन्यद् एव ] दूसरे [तीर्थं ] तीर्थको [मा
याहि ] मत जावे, [अन्यद् एव ] दूसरे [गुरुं ] गुरुको [मा सेवस्व ] मत सेवे, [अन्यद् एव ]
अन्य [देवं ] देवको [मा चिन्तय ] मत ध्यावे, [आत्मानं विमलं ] रागादि मल रहित आत्माको
[मुक्तवा ] छोड़कर अर्थात् अपना आत्मा ही तीर्थ है, वहाँ रमण कर, आत्मा ही गुरु है, उसकी
सेवा कर और आत्मा ही देव है उसीकी आराधना कर
भावार्थ :यद्यपि व्यवहारनयसे मोक्षके स्थानक सम्मेदशिखर आदि व जिनप्रतिमा
ଅହୀଂ, ଉକ୍ତ ଲକ୍ଷଣଵାଳୋ ଅଭେଦରତ୍ନତ୍ରଯରୂପେ ପରିଣମେଲୋ ପରମାତ୍ମା ଜ ଉପାଦେଯ ଛେ, ଏଵୋ
ଭାଵାର୍ଥ ଛେ. ୯୪.
ହଵେ, ନିଶ୍ଚଯନଯଥୀ ଵୀତରାଗଭାଵରୂପେ ପରିଣମେଲୋ ସ୍ଵଶୁଦ୍ଧାତ୍ମା ଜ ନିଶ୍ଚଯତୀର୍ଥ ଛେ, ନିଶ୍ଚଯଗୁରୁ
ଛେ, ନିଶ୍ଚଯଦେଵ ଛେ ଏମ କହେ ଛେ :
ଭାଵାର୍ଥ:ଜୋ କେ ଵ୍ଯଵହାରନଯଥୀ ନିର୍ଵାଣସ୍ଥାନ, ଚୈତ୍ଯ (ଜିନ ପ୍ରତିମା), ଚୈତ୍ଯାଲଯ
अत्रोक्त लक्षणेऽ ତେନେ ବଦଲେ अत्रोक्त लक्षणोऽ ଏମ ହୋଵୁଂ ଜୋଈଏ.