Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
ଅଧିକାର-୧ : ଦୋହା-୯୬ ]ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ: [ ୧୫୯
अण्णु सव्वु ववहारु अन्यः शेषः सर्वोऽपि व्यवहारः । तेन कारणेन एक्कु जि जोइय झाइयइ
हे योगिन्, एक एव ध्यायते । यः आत्मा कथंभूतः । जो तइलोयहं सारु यः परमात्मा
त्रैलोक्यस्य सारभूत इति । तद्यथा । वीतरागचिदानन्दैकस्वभावात्मतत्त्वसम्यक्श्रद्धान-
ज्ञानानुभूतिरूपाभेदरत्नत्रयलक्षणनिर्विकल्पत्रिगुप्तिसमाधिपरिणतो निश्चयनयेन स्वात्मैव सम्यक्त्वं
अन्यः सर्वोऽपि व्यवहारस्तेन कारणेन स एव ध्यातव्य इति । अत्र यथा द्राक्षा-
कर्पूरश्रीखण्डादिबहुद्रव्यैर्निष्पन्नमपि पानकमभेदविवक्षया कृत्वैकं भण्यते, तथा शुद्धा-
त्मानुभूतिलक्षणैर्निश्चयसम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रैर्बहुभिः परिणतो अनेकोऽप्यात्मात्वभेदविवक्षया
एकोऽपि भण्यत इति भावार्थः । तथा चोक्तं अभेदरत्नत्रयलक्षणम् — ‘‘दर्शनमात्म-
विनिश्चितिरात्मपरिज्ञानमिष्यते बोधः । स्थितिरात्मन चारित्रं कुत एतेभ्यो भवति
बन्धः ।।’’ ।।९६।।
अनुभवरूप जो अभेदरत्नत्रय वही जिसका लक्षण है, तथा मनोगुप्ति आदि तीन गुप्तिरूप
समाधिमें लीन निश्चयनयसे निज आत्मा ही निश्चयसम्यक्त्व है, अन्य सब व्यवहार है । इस
कारण आत्मा ही ध्यावने योग्य है । जैसे दाख, कपूर, चन्दन इत्यादि बहुत द्रव्योंसे बनाया गया
जो पीनेका रस यद्यपि अनेक रसरूप है, तो भी अभेदनयकर एक पानवस्तु कही जाती है,
उसी तरह शुद्धात्मानुभूतिस्वरूप निश्चयसम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्रादि अनेक भावोंसे परिणत हुआ
आत्मा अनेकरूप है, तो भी अभेदनयकी विवक्षासे आत्मा एक ही वस्तु है । यही
अभेदरत्नत्रयका स्वरूप जैन सिद्धान्तोंमें हरएक जगह कहा है — ‘‘दर्शनमित्यादि’’ इसका अर्थ
ऐसा है, कि आत्माका निश्चय वह सम्यग्दर्शन है, आत्माका जानना वह सम्यग्ज्ञान है, और
ଭାଵାର୍ଥ: — ନିଶ୍ଚଯନଯଥୀ ଵୀତରାଗ ଚିଦାନଂଦ ଜ ଜେନୋ ଏକ ସ୍ଵଭାଵ ଛେ ଏଵା
ଆତ୍ମତତ୍ତ୍ଵନାଂ ସମ୍ଯକ୍ଶ୍ରଦ୍ଧାନ, ସମ୍ଯଗ୍ଜ୍ଞାନ ଅନେ ସମ୍ଯକ୍ଅନୁଭୂତିରୂପ ଅଭେଦରତ୍ନତ୍ରଯସ୍ଵରୂପ ଅନେ
ନିର୍ଵିକଲ୍ପ ତ୍ରିଗୁପ୍ତିଯୁକ୍ତ ସମାଧିମାଂ ପରିଣମେଲୋ ସ୍ଵାତ୍ମା ଜ ସମ୍ଯକ୍ତ୍ଵ ଛେ, ବାକୀନୋ ବଧୋଯ ଵ୍ଯଵହାର
ଛେ, ତେଥୀ ତେ ଜ (ସ୍ଵାତ୍ମା ଜ) ଧ୍ଯାଵଵା ଯୋଗ୍ଯ ଛେ.
ଅହୀଂ ଜେଵୀ ରୀତେ ଦ୍ରାକ୍ଷ, କପୂର, ଚଂଦନାଦି ଅନେକ ଦ୍ରଵ୍ଯୋଥୀ ବନେଲ ପାନକ ଅଭେଦ ଵିଵକ୍ଷାଏ
କରୀନେ ଏକ ଜ କହେଵାଯ ଛେ, ତେଵୀ ରୀତେ ଶୁଦ୍ଧଆତ୍ମାନୀ ଅନୁଭୂତିସ୍ଵରୂପ ନିଶ୍ଚଯସମ୍ଯଗ୍ଦର୍ଶନ-
ଜ୍ଞାନଚାରିତ୍ରାତ୍ମକ ଅନେକ ଭାଵୋରୂପେ ପରିଣମେଲୋ ଆତ୍ମା ଅନେକ ହୋଵା ଛତାଂ ଅଭେଦଵିଵକ୍ଷାଥୀ ଏକ ଜ
କହେଵାଯ ଛେ, ଏଵୋ ଭାଵାର୍ଥ ଛେ. (ଶ୍ରୀ ଅମୃତଚଂଦ୍ରାଚାର୍ଯ କୃତ ପୁରୁଷାର୍ଥସିଦ୍ଧ୍ଯୁପାଯ ଗାଥା ୨୧୬ମାଂ)
ଅଭେଦରତ୍ନତ୍ରଯନୁଂ ସ୍ଵରୂପ ଏ ଜ ପ୍ରମାଣେ କହ୍ଯୁଂ ଛେ କେ : — ‘‘दर्शनमात्मविनिश्चितिरात्मपरिज्ञानमिष्यते बोधः
।
स्थितिरात्मनि चारित्रं कुत एतेभ्यो भवति बंधः ।।’’ଅର୍ଥ: — ଆତ୍ମାନା ସ୍ଵରୂପନୋ ନିଶ୍ଚଯ ଥଵୋ ତେ
ସମ୍ଯଗ୍ଦର୍ଶନ ଛେ, ଆତ୍ମାନା ସ୍ଵରୂପନୁଂ ପରିଜ୍ଞାନ ଥଵୁଂ ତେ ସମ୍ଯଗ୍ଜ୍ଞାନ ଛେ ଅନେ ଆତ୍ମସ୍ଵରୂପମାଂ ଲୀନ