Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration). Gatha-96 (Adhikar 1).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
୧୫୮ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୧ : ଦୋହା-୯୬
भण्यते, तथापि निश्चयनयेन परमाराध्यत्वाद्वीतरागनिर्विकल्पत्रिगुप्तिपरमसमाधिकाले
स्वशुद्धात्मस्वभाव एव देव इति
एवं निश्चयव्यवहाराभ्यां साध्यसाधकभावेन तीर्थगुरुदेवतास्वरूपं
ज्ञातव्यमिति भावार्थः ।।९५।।
अथ निश्चयेनात्मसंवित्तिरेव दर्शनमिति प्रतिपादयति
९६) अप्पा दंसणु केवलु वि अण्णु सव्वु ववहारु
एक्कु जि जोइय झाइयइ जो तइलोयहँ सारु ।।९६।।
आत्मा दर्शनं केवलोऽपि अन्यः सर्वः व्यवहारः
एक एव योगिन् ध्यायते यः त्रैलोक्यस्य सारः ।।९६।।
अप्पा दंसणु केवलु वि आत्मा दर्शनं सम्यक्त्वं भवति कथंभूतोऽपि केवलोऽपि
व्यवहारदेव जिनेन्द्र तथा उनकी प्रतिमा, व्यवहारगुरु महामुनिराज, व्यवहारतीर्थ सिद्धक्षेत्रादिक
ये सब निश्चयके साधक हैं, इसलिये प्रथम अवस्थामें आराधने योग्य हैं
तथा निश्चयनयकर
ये सब पदार्थ हैं, उनसे साक्षात् सिद्धि नहीं है, परम्परासे है यहाँ श्रीपरमात्मप्रकाश अध्यात्म-
ग्रंथमें निश्चयदेव गुरु तीर्थ अपना आत्मा ही है, उसे आराधनाकर अनंत सिद्ध हुए और होवेंगे,
ऐसा सारांश हुआ
।।९५।।
आगे निश्चयनयकर आत्मस्वरूप ही सम्यग्दर्शन है
गाथा९६
अन्वयार्थ :[केवलः आत्मा अपि ] केवल (एक) आत्मा ही [दर्शनं ]
सम्यग्दर्शन है, [अन्यः सर्वः व्यवहारः ] दूसरा सब व्यवहार है, इसलिये [योगिन् ] हे योगी
[एक एव ध्यायते ] एक आत्मा ही ध्यान करने योग्य है, [यः त्रैलोक्यस्य सारः ] जो कि
तीन लोकमें सार है
भावार्थ :वीतराग चिदानंद अखंड स्वभाव, आत्मतत्त्वका सम्यक् श्रद्धान ज्ञान
ଏ ପ୍ରମାଣେ ସାଧ୍ଯସାଧକଭାଵଥୀ ନିଶ୍ଚଯ ଵ୍ଯଵହାରନଯଥୀ ତୀର୍ଥ, ଗୁରୁ ଅନେ ଦେଵନୁଂ ସ୍ଵରୂପ
ଜାଣଵୁଂ, ଏଵୋ ଭାଵାର୍ଥ ଛେ. ୯୫.
ହଵେ, ନିଶ୍ଚଯଥୀ ଆତ୍ମସଂଵିତ୍ତି ଜ (ଆତ୍ମାନୁଂ ସଂଵେଦନ ଜ) ଦର୍ଶନ (ସମ୍ଯକ୍ତ୍ଵ) ଛେ, ଏମ କହେ
ଛେ :
୧ ସାଧ୍ଯସାଧକଭାଵନାଂ ସ୍ପଷ୍ଟୀକରଣ ମାଟେ ଶ୍ରୀପଂଚାସ୍ତିକାଯ ଗୁଜରାତୀ ଗାଥା ୧୬୬ ଥୀ ୧୭୨ ସୁଧୀନୀ
ଫୂଟନୋଟ ଜୁଓ.