Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
ଅଧିକାର-୧ : ଦୋହା-୯୭ ]ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ: [ ୧୬୧
लब्भइ यं परमात्मानं ध्यायमानानां परमपदं लभ्यते केन कारणभूतेन एक्कखणेण
एकक्षणेनान्तर्मुहूर्तेनापि तथाहि समस्तशुभाशुभसंकल्पविकल्परहितेन स्वशुद्धात्म-
तत्त्वध्यानेनान्तर्मुहूर्तेन मोक्षो लभ्यते तेन कारणेन तदेव निरन्तरं ध्यातव्यमिति तथा चोक्तं
बृहदाराधनाशास्त्रे षोडशतीर्थंकराणां एकक्षणे तीर्थकरोत्पत्तिवासरे प्रथमे श्रामण्यबोधसिद्धिः
अन्तर्मुहूर्तेन निर्वृत्ता अत्राह शिष्यः यद्यन्तर्मुहूर्तपरमात्मध्यानेन मोक्षो भवति तर्हि
इदानीमस्माकं तद्धयानं कुर्वाणानां किं न भवति परिहारमाह याद्रशं तेषां
प्रथमसंहननसहितानां शुक्लध्यानं भवति ताद्रशमिदानीं नास्तीति तथा चोक्त म्‘‘अत्रेदानीं
निषेधन्ति शुक्लध्यानं जिनोत्तमाः धर्मध्यानं पुनः प्राहुः श्रेणिभ्यां प्राग्विवर्तिनम् ।।’’ अत्र
बृहदाराधना-शास्त्रमें कहा है सोलह तीर्थंकरोंके एक ही समय तीर्थंकरोंके उत्पत्तिके दिन
पहले चारित्र ज्ञानकी सिद्धि हुई, फि र अंतर्मुहूर्तमें मोक्ष हो गया यहाँ पर शिष्य प्रश्न करता
है कि यदि परमात्माके ध्यानसे अंतर्मुहूर्तमें मोक्ष होता है, तो इस समय ध्यान करनेवाले हम
लोगोंको क्यों नहीं होता ? उसका समाधान इस तरह है
कि जैसा निर्विकल्प शुक्लध्यान
वज्रवृषभनाराचसंहननवालोंको चौथे कालमें होता है, वैसा अब नहीं हो सकता ऐसा ही दूसरे
ग्रंथोंमें कहा है‘‘अत्रेत्यादि’’ इसका अर्थ यह है, कि श्रीसर्वज्ञवीतरागदेव इस भरतक्षेत्रमें
इस पंचमकालमें शुक्लध्यानका निषेध करते हैं, इस समय धर्मध्यान हो सकता है, शुक्लध्यान
नहीं हो सकता
उपशमश्रेणी और क्षपकश्रेणी दोनों ही इस समय नहीं हैं, सातवाँ गुणस्थान
ଅନ୍ତର୍ମୁହୂର୍ତମାଂ ମୋକ୍ଷ ମଳେ ଛେ ତେଥୀ ତେ ଜ ନିରଂତର ଧ୍ଯାଵଵା ଯୋଗ୍ଯ ଛେ. ବୃହଦାରାଧନା ଶାସ୍ତ୍ରମାଂ ପଣ
କହ୍ଯୁଂ ଛେ କେ :‘‘षोडशतीर्थंकराणां एकक्षणे तीर्थकरोत्पत्तिवासरे प्रथमे श्रामण्यबोधसिद्धिः अन्तर्मुहूर्तेन
निवृता (ଅର୍ଥ :ୠଷଭନାଥଥୀ ମାଂଡୀନେ ଶାଂତିନାଥ ତୀର୍ଥଂକର ସୁଧୀ ସୋଳ ତୀର୍ଥଂକରୋନେ ଜେ ଦିଵସେ
ଦିଵ୍ଯଧ୍ଵନିନୀ ଉତ୍ପତ୍ତି ଥଈ ହତୀ ତେ ପ୍ରଥମ ଦିଵସେ ବହୁ ମୁନିଓନେ ଶ୍ରାମଣ୍ଯବୋଧସିଦ୍ଧି (ଚାରିତ୍ର ଅନେ
କେଵଳଜ୍ଞାନନୀ ସିଦ୍ଧି) ଏକ କ୍ଷଣେ-ଅନ୍ତର୍ମୁହୂର୍ତମାଂ-ଥଈ).
ଅହୀଂ, ଶିଷ୍ଯ ପ୍ରଶ୍ନ କରେ ଛେ କେଜୋ ପରମାତ୍ମାନା ଧ୍ଯାନଥୀ ଅନ୍ତର୍ମୁହୂର୍ତମାଂ ମୋକ୍ଷ ଥାଯ ଛେ ତୋ
ଅତ୍ଯାରେ ତେନୁଂ ଧ୍ଯାନ କରନାରା ଅମନେ କେମ ମୋକ୍ଷ ଥତୋ ନଥୀ?
ତେନୁଂ ସମାଧାନ :ପ୍ରଥମ ସଂହନନଵାଳାନେ (ଵଜ୍ରଵୃଷଭନାରାଚସଂହନନଵାଳା ଜୀଵୋନେ) ଜେଵୁଂ
ଶୁକ୍ଲଧ୍ଯାନ ଥାଯ ଛେ ତେଵୁଂ ଶୁକ୍ଲଧ୍ଯାନ ଅତ୍ଯାରେ ଥତୁଂ ନଥୀ, (ଶ୍ରୀ ରାମସେନକୃତ ତତ୍ତ୍ଵାନୁଶାସନ ଗାଥା
୮୩ମାଂ) କହ୍ଯୁଂ ପଣ ଛେ କେ
‘‘अत्रेदानीं निषेधन्ति शुक्लध्यानं जिनोत्तमाः धर्मध्यानं पुनः प्राहुः श्रेणिभ्यां
प्राग्विवर्तिनाम् ।।’’ଅର୍ଥ:ସର୍ଵଜ୍ଞଵୀତରାଗଜିନଵରଦେଵେ ଆ ଭରତକ୍ଷେତ୍ରମାଂ ଅତ୍ଯାରେ (ଆ ପଂଚମକାଳମାଂ)
୧. ପାଠାନ୍ତର :कारणभूतेन=करणभूतेन
୨. ଆ ଗାଥା ସଂସ୍କୃତ ଟୀକାଵାଳୀ ଭଗଵତୀ ଆରାଧନାମାଂ ପାନ ୧୭୭୧, ଗାଥା ୨୨୨୮ମାଂ ଛେ.