Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
୧୬୨ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୧ : ଦୋହା-୯୮
येन कारणेन परमात्मध्यानेनान्तर्मुहूर्तेन मोक्षो लभ्यते तेन कारणेन संसारस्थिति-
च्छेदनार्थमिदानीमपि तदेव ध्यातव्यमिति भावार्थः ।।९७।।
अथ अस्य वीतरागमनसि शुद्धात्मभावना नास्ति तस्य शास्त्रपुराणतपश्चरणानि किं
कुर्वन्तीति कथयति —
९८) अप्पा णिय – मणि णिम्मलउ णियमेँ वसइ ण जासु ।
सत्थ – पुराणइँ तव – चरणु मुक्खु वि करहिँ कि तासु ।।९८।।
आत्मा निजमनसि निर्मलः नियमेन वसति न यस्य ।
शास्त्रपुराणानि तपश्चरणं मोक्षं अपि कुर्वन्ति किं तस्य ।।९८।।
तक गुणस्थान है, ऊ परके गुणस्थान नहीं हैं । इस जगह तात्पर्य यह हैं कि जिस कारण
परमात्माके ध्यानसे अंतर्मुहूर्तमें मोक्ष होता है, इसलिये संसारकी स्थिति घटानेके वास्ते अब
भी धर्मध्यानका आराधन करना चाहिये, जिससे परम्परया मोक्ष भी मिल सकता है ।।९७।।
आगे ऐसा कहते हैं कि, जिसके राग रहित मनमें शुद्धात्माकी भावना नहीं है, उनके
शास्त्र, पुराण, तपश्चरण क्या कर सकते हैं ? अर्थात् कुछ भी नहीं कर सकते —
गाथा – ९८
अन्वयार्थ : — [यस्य ] जिसके [निजमनसि ] निज मनमें [निर्मलः आत्मा ] निर्मल
आत्मा [नियमेन ] निश्चयसे [न वसति ] नहीं रहता, [तस्य ] उस जीवके [शास्त्रपुराणानि ]
ଶୁକ୍ଲଧ୍ଯାନନୋ ନିଷେଧ କର୍ଯୋ ଛେ ପଣ ତେମଣେ ଆ କାଳମାଂ ଧର୍ମଧ୍ଯାନ କହ୍ଯୁଂ ଛେ, (ଧର୍ମଧ୍ଯାନ ହୋଯ ଏମ
କହ୍ଯୁଂ ଛେ.) ଉପଶମ ଅନେ କ୍ଷପକଶ୍ରେଣୀଥୀ ନୀଚେନା ଗୁଣସ୍ଥାନମାଂ ଵର୍ତତା ଜୀଵୋନେ ଧର୍ମଧ୍ଯାନ ହୋଈ ଶକେ
ଛେ ତେଵୀ ଭଗଵାନନୀ ଆଜ୍ଞା ଛେ.
ଅହୀଂ, ଜେ କାରଣେ ପରମାତ୍ମାନା ଧ୍ଯାନଥୀ ଅନ୍ତର୍ମୁହୂର୍ତମାଂ ମୋକ୍ଷ ମଳେ ଛେ ତେ କାରଣେ ସଂସାରନୀ
ସ୍ଥିତି ଛେଦଵା ମାଟେ ଅତ୍ଯାରେ ପଣ (ଆ ପଂଚମକାଳମାଂ ପଣ) ତେ ଜ ପରମାତ୍ମାନୁଂ ଧ୍ଯାନ କରଵା ଯୋଗ୍ଯ
ଛେ, ଏଵୋ ଭାଵାର୍ଥ ଛେ. ୯୭✽.
ହଵେ, କହେ ଛେ କେ ଜେନା ରାଗରହିତ ମନମାଂ ଶୁଦ୍ଧାତ୍ମଭାଵନା ନଥୀ ତେନେ ଶାସ୍ତ୍ର, ପୁରାଣ,
ତପଶ୍ଚରଣାଦି ଶୁଂ କରେ? ତେ କହେ ଛେ.
✽ଆ ଗାଥା ସଂସ୍କୃତ ଟୀକାଵାଳୀ ଭଗଵତୀ ଆରାଧନା ଆଶ୍ଵାସ ୭, ଗାଥା ୨୦୨୮ ପାନା
୧୭୭୨ନୀ ସଂସ୍କୃତ ଟୀକାମାଂ ଆଧାରରୂପେ ଆପେଲ ଛେ.