Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration). Gatha-119 (Adhikar 1).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
ଅଧିକାର-୧ : ଦୋହା-୧୧୯ ]ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ: [ ୧୯୧
सूत्रमिदं कथयन्ति
११९) जोइय णिय-मणि णिम्मलए पर दीसइ सिउ संतु
अंबरि णिम्मलि घणरहिए भाणु जि जेम फु रंतु ।।११९।।
योगिन् निजमनसि निर्मले परं द्रश्यते शिवः शान्तः
अम्बरे निर्मले घनरहिते भानुः इव यथा स्फु रन् ।।११९।।
जोइय इत्यादि जोइय हे योगिन् णियमणि निजमनसि कथंभूते णिम्मलए निर्मले
परं नियमेन दीसइ द्रश्यते कोऽसौ कर्मतापन्नः सिउ शिवशब्दवाच्यो निजपरमात्मा
कथंभूतः संतु शान्तः रागादिरहितः द्रष्टान्तमाह अम्बरे आकाशे कथंभूते णिम्मलि
निर्मले पुनरपि कथंभूते घणरहिए घनरहिते क इव भाणु जि भानुरिव यथा किं कुर्वन्
फु रंतु स्फु रन् प्रकाशमान इति अयमत्र तात्पर्यार्थः यथा घनघटाटोपविघटने सति
निर्मलाकाशे दिनकरः प्रकाशते तथा शुद्धात्मानुभूतिप्रतिपक्षभूतानां कामक्रोधादि-
विकल्परुपघनानां विनाशे सति निर्मलचित्ताकाशे केवलज्ञानाद्यनन्तगुणकरकलितः
अभिप्राय मनमें रखकर यह गाथा-सूत्र कहते हैं
गाथा११९
अन्वयार्थ :[योगिन् ] हे योगी, [निर्मले निजमनसि ] निर्मल अपने मनमें [शिवः
शांतः ] निज परमात्मा रागादि रहित [परं ] नियमसे [दृश्यते ] दिखता है, [यथा ] जैसे
[धनरिहते निर्मले ] बादल रहित निर्मल [अंबरे ] आकाशमें [भानुः इव ] सूर्यके समान
[स्फु रन् ] भासमान (प्रकाशमान) है
भावार्थ :जैसे मेघमालाके आडंबरसे सूर्य नहीं भासतादिखता और मेघके
आडंबरके दूर होने पर निर्मल आकाशमें सूर्य स्पष्ट दिखता है, उसी तरह शुद्ध आत्माकी
अनुभूतिके शत्रु जो काम-क्रोधादि विकल्परूप मेघ हैं, उनके नाश होने पर निर्मल
ଅଭିପ୍ରାଯ ମନମାଂ ରାଖୀନେ ଆ ଗାଥାସୂତ୍ର କହେ ଛେ :
ଭାଵାର୍ଥ:ଜେଵୀ ରୀତେ ଘଟାଟୋପ ଵାଦଳାଂ ଵୀଖରାଈ ଜତାଂ, ନିର୍ମଳ ଆକାଶମାଂ ସୂର୍ଯ ପ୍ରକାଶେ
ଛେ ତେଵୀ ରୀତେ ଶୁଦ୍ଧାତ୍ମାନୀ ଅନୁଭୂତିଥୀ ପ୍ରତିପକ୍ଷଭୂତ କାମକ୍ରୋଧାଦି ଵିକଲ୍ପରୂପ ଵାଦଳାଂଓନୋ ନାଶ ଥତାଂ,
୧ ପାଠାନ୍ତର :कथयन्ति = प्रतिपादयति