Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
୧୯୨ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୧ : ଦୋହା-୧୨୦
निजशुद्धात्मादित्यः प्रकाशं करोतीति ।।११९।।
अथ यथा मलिने दर्पणे रूपं न द्रश्यते तथा रागादिमलिनचित्ते शुद्धात्मस्वरूपं न द्रश्यत
इति निरूपयति —
१२०) राएँ रंगिए हियवडए देउ ण दीसइ संतु ।
दप्पणि मइलए बिंबु जिम एहउ जाणि णिभंतु ।।१२०।।
रागेन रञ्जिते हृदये देवः न द्रश्यते शान्तः ।
दर्पणे मलिने बिम्बं यथा एतत् जानीहि निर्भ्रान्तम् ।।१२०।।
राएं इत्यादि । राएं रंगिए हियवडए रागेन रज्जिते हृदये देउ ण दीसइ देवो न द्रश्यते ।
किंविशिष्टः संतु शान्तो रागादिरहितः ।द्रष्टांतमाह । दप्पणि मइलए दर्पणे मलिने बिंबु जिम
मनरूपी आकाशमें केवलज्ञानादि अनंतगुणरूप किरणोंकर सहित निज शुद्धात्मारूपी सूर्य
प्रकाश करता है ।।११९।।
आगे जैसे मैले दर्पणमें रूप नहीं दीखता, उसी तरह रागादिकर मलिन चित्तमें शुद्ध
आत्मस्वरूप नहीं दिखता, ऐसा कहते हैं —
गाथा – १२०
अन्वयार्थ : — [रागेन रंजिते ] रागकरके रंजित [हृदये ] मनमें [शांतः देवः ] रागादि
रहित आत्म देव [न दृश्यते ] नहीं दीखता, [यथा ] जैसे कि [मलिने दर्पणे ] मैले दर्पणमें
[बिंबं ] मुख नहीं भासता [एतत् ] यह बात हे प्रभाकर भट्ट, तू [निर्भ्रान्तम् ] संदेह रहित
[जानीहि ] जान ।
भावार्थ : — ऐसा श्री योगीन्द्राचार्यने उपदेश दिया है कि जैसे सहस्र किरणोंसे शोभित
सूर्य आकाशमें प्रत्यक्ष दिखता है, लेकिन मेघसमूहकर ढँका हुआ नहीं दिखता, उसी तरह
ନିର୍ମଳ ଚିତ୍ତରୂପୀ ଆକାଶମାଂ କେଵଳଜ୍ଞାନାଦି ଅନଂତଗୁଣରୂପୀ କିରଣୋଥୀ ଯୁକ୍ତ ନିଜଶୁଦ୍ଧାତ୍ମାରୂପୀ ସୂର୍ଯ
ପ୍ରକାଶ କରେ ଛେ, ଏ ତାତ୍ପର୍ଯାର୍ଥ ଛେ. ୧୧୯.
ହଵେ, ଜେଵୀ ରୀତେ ମଲିନ ଦର୍ପଣମାଂ ରୂପ ଦେଖାତୁଂ ନଥୀ ତେଵୀ ରୀତେ ରାଗାଦିଥୀ ମଲିନ ଚିତ୍ତମାଂ
ଶୁଦ୍ଧାତ୍ମସ୍ଵରୂପ ଦେଖାତୁଂ ନଥୀ, ଏମ କହେ ଛେ : —
ଭାଵାର୍ଥ: — ଜେଵୀ ରୀତେ ମେଘପଟଲଥୀ ଆଚ୍ଛାଦିତ ଥଯେଲୋ, (ସହସ୍ର କିରଣୋଥୀ) ଶୋଭିତ ସୂର୍ଯ
ଵିଦ୍ଯମାନ ହୋଵା ଛତାଂ ପଣ, ଦେଖାତୋ ନଥୀ ତେଵୀ ରୀତେ କାମକ୍ରୋଧାଦି ଵିକଲ୍ପରୂପ ଵାଦଳାଂଥୀ ଆଚ୍ଛାଦିତ