Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration). Gatha-8 (Adhikar 2).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
निरन्तरमभिलषणीयमिति भावार्थः ।।।।
अथ सर्वेषां परमपुरुषाणां मोक्ष एव ध्येय इति प्रतिपादयति
१३४) हरि-हर-बंभु वि जिणवर वि मुणि-वर-विंद वि भव्व
परम-णिरंजणि मणु धरिवि मुक्खु जि झायहिँ सव्व ।।।।
हरिहरब्रह्माणोऽपि जिनवरा अपि मुनिवरवृन्दान्यपि भव्याः
परमनिरञ्जने मनः धृत्वा मोक्षं एव ध्यायन्ति सर्वे ।।।।
हरिहर इत्यादि हरि-हर-बंभु वि हरिहरब्रह्माणोऽपि जिणवर वि जिनवरा अपि मुणि-
वर-विंद वि मुनिवरवृन्दान्यपि भव्व शेषभव्या अपि एते सर्वे किं कुर्वन्ति परम-णिरंजणि
है कि हमेशा मोक्षका ही सुख अभिलाषा करने योग्य है, और संसारपर्याय सब हेय है ।।।।
आगे सभी महान पुरुषोंके मोक्ष ही ध्यावने योग्य है ऐसा कहते हैं
गाथा
अन्वयार्थ :[हरिहरब्रह्माणोऽपि ] नारायण वा इन्द्र, रुद्र अन्य ज्ञानी पुरुष
[जिनवरा अपि ] श्रीतीर्थंकर परमदेव [मुनिवरवृंदान्यपि ] मुनीश्वरोंके समूह तथा [भव्याः ]
अन्य भी भव्य जीव [परमनिरंजने ] परम निरंजनमें [मनः धृत्वा ] मन रखकर [सर्वे ] सब
ही [मोक्षं ] मोक्षको [एव ] ही [ध्यायंति ] ध्यावते हैं
यह मन विषयकषायोंमें जो जाता है,
उसको पीछे लौटाकर अपने स्वरूपमें स्थिर अर्थात् निर्वाणका साधनेवाला करते हैं
भावार्थ :श्री तीर्थंकरदेव तथा चक्रवर्ती, बलदेव, वासुदेव, प्रतिवासुदेव महादेव
इत्यादि सब प्रसिद्ध पुरुष अपने शुद्ध ज्ञान, अखंड स्वभाव जो निज आत्मद्रव्य उसका सम्यक्
ଅତିଶଯଵାଳୁଂ, ବାଧାରହିତ, ଵିଶାଳ, ଵୃଦ୍ଧି-ହାନି ରହିତ, ଵିଷଯୋଥୀ ରହିତ, ନିର୍ଦ୍ଵନ୍ଦ୍ଵ (ଦ୍ଵନ୍ଦ୍ଵଭାଵଥୀ
ରହିତ), ଅନ୍ଯ ଦ୍ରଵ୍ଯନୀ ଅପେକ୍ଷା ଵଗରନୁଂ, ନିରୁପମ, ଅମିତ, ଶାଶ୍ଵତ, ସଦାକାଳ, ଉତ୍କୃଷ୍ଟ ଅନେ ଅନଂତ
ସାରଵାଳୁଂ ଏଵୁଂ ପରମସୁଖ ହଵେ ସିଦ୍ଧଭଗଵାନନେ ଉତ୍ପନ୍ନ ଥଯୁଂ.]
ଅହୀଂ, ଆନୀ ଜ (ମୋକ୍ଷନୀ ଜ) ନିରଂତର ଅଭିଲାଷା କରଵା ଯୋଗ୍ଯ ଛେ ଏଵୋ ଭାଵାର୍ଥ ଛେ. ୭.
ହଵେ, ସର୍ଵ ପରମପୁରୁଷୋଏ ମୋକ୍ଷ ଜ ଧ୍ଯାଵଵା ଯୋଗ୍ଯ ଛେ, ଏମ କହେ ଛେ :
ଭାଵାର୍ଥ:ହରି, ହର ଆଦି ବଧାଯ ପ୍ରସିଦ୍ଧ ପୁରୁଷୋ ଖ୍ଯାତି, ପୂଜା, ଲାଭ ଆଦି ସମସ୍ତ
ଵିକଲ୍ପ ଜାଳଥୀ ଶୂନ୍ଯ ଏଵା, ଶୁଦ୍ଧ, ବୁଦ୍ଧ ଏକ ସ୍ଵଭାଵଵାଳା ନିଜଆତ୍ମଦ୍ରଵ୍ଯନାଂ ସମ୍ଯକ୍ଶ୍ରଦ୍ଧାନ,
୨୧୨ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୮