Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
परमनिरञ्जनाभिधाने निजपरमात्मस्वरूपे । मणु मनः धरिवि विषयकषायेषु गच्छत् सद्
व्यावृत्त्य धृत्वा पश्चात् मुक्खु जि मोक्षमेव झायहिं ध्यायन्ति सव्व सर्वेऽपि इति । तद्यथा ।
हरिहरादयः सर्वेऽपि प्रसिद्धपुरुषाः ख्यातिपूजालाभादिसमस्तविकल्पजालेन शून्ये, शुद्धबुद्धैक-
स्वभावनिजात्मद्रव्यसम्यक्श्रद्धानज्ञानानुचरणरूपाभेदरत्नत्रयात्मकनिर्विकल्पसमाधिसमुत्पन्नवीतराग-
सहजानन्दैकसुखरसानुभवेन पूर्णकलशवत् भरितावस्थे निरञ्जनशब्दाभिधेयपरमात्मध्याने स्थित्वा
मोक्षमेव ध्यायन्ति । अयमत्र भावार्थः । यद्यपि व्यवहारेण सविकल्पावस्थायां वीतराग-
सर्वज्ञस्वरूपं तत्प्रतिबिम्बानि तन्मन्त्राक्षराणि तदाराधकपुरुषाश्च ध्येया भवन्ति तथापि वीतराग-
निर्विकल्पत्रिगुप्तिगुप्तपरमसमाधिकाले निजशुद्धात्मैव ध्येय इति ।।८।।
अथ भुवनत्रयेऽपि मोक्षं मुक्त्वा अन्यत्परमसुखकारणं नास्तीति निश्चिनोति —
श्रद्धान ज्ञान आचरणरूप जो अभेदरत्नत्रयमय समाधिकर उत्पन्न वीतराग सहजानंद
अतीन्द्रियसुखरस उसके अनुभवसे पूर्ण कलशकी तरह भरे हुए निरंतर निराकार निजस्वरूप
परमात्माके ध्यानमें स्थिर होकर मुक्त होते हैं । कैसा वह ध्यान है, कि ख्याति (प्रसिद्धि) पूजा
(अपनी महिमा) और धनादिकका लाभ इत्यादि समस्त विकल्प – जालोंसे रहित है । यहाँ
केवल आत्म – ध्यान ही को मोक्ष – मार्ग बतलाया है, और अपना स्वरूप ही ध्यावने योग्य है ।
तात्पर्य यह है कि यद्यपि व्यवहारनयकर प्रथम अवस्थामें वीतरागसर्वज्ञका स्वरूप अथवा
वीतरागके नाममंत्रके अक्षर अथवा वीतरागके सेवक महामुनि ध्यावने योग्य हैं, तो भी वीतराग
निर्विकल्प तीन गुप्तिरूप परमसमाधिके समय अपना शुद्ध आत्मा ही ध्यान करने योग्य है, अन्य
कोई भी दूसरा पदार्थ पूर्ण अवस्थामें ध्यावने योग्य नहीं है ।।८।।
अब तीन लोकमें मोक्षके सिवाय अन्य कोई भी परमसुखका कारण नहीं है, ऐसा
निश्चय करते हैं —
ସମ୍ଯଗ୍ଜ୍ଞାନ ଅନେ ସମ୍ଯଗ୍ଚାରିତ୍ରରୂପ ଅଭେଦ ରତ୍ନତ୍ରଯାତ୍ମକ ନିର୍ଵିକଲ୍ପ ସମାଧିଥୀ ଉତ୍ପନ୍ନ ମାତ୍ର
ଵୀତରାଗ ସହଜାନଂଦରୂପ ସୁଖରସନା ଅନୁଭଵଥୀ ପୂର୍ଣକଲଶନୀ ଜେମ ପରିପୂର୍ଣ ଏଵା ନିରଂଜନ ଶବ୍ଦଥୀ
କହେଵା ଯୋଗ୍ଯ ପରମାତ୍ମାନା ଧ୍ଯାନମାଂ ସ୍ଥିତ ଥଈନେ ଏକ ମୋକ୍ଷନେ ଜ ଧ୍ଯାଵେ ଛେ.
ଅହୀଂ, ଆ ଭାଵାର୍ଥ ଛେ କେ ଜୋ କେ ଵ୍ଯଵହାରନଯଥୀ ସଵିକଲ୍ପ ଅଵସ୍ଥାମାଂ ଵୀତରାଗ ସର୍ଵଜ୍ଞନୁଂ
ସ୍ଵରୂପ, ଵୀତରାଗନୀ ପ୍ରତିମା, ତେନା ମଂତ୍ରାକ୍ଷରୋ ଅନେ ତେନା ଆରାଧକ ପୁରୁଷୋ ଧ୍ଯାଵଵା ଯୋଗ୍ଯ ଛେ ତୋ ପଣ
ଵୀତରାଗ ନିର୍ଵିକଲ୍ପ ତ୍ରିଗୁପ୍ତି ଵଡେ ଗୁପ୍ତ ପରମସମାଧିକାଳମାଂ ଶୁଦ୍ଧ ଆତ୍ମା ଜ ଧ୍ଯାଵଵା ଯୋଗ୍ଯ ଛେ. ୮.
ହଵେ, ତ୍ରଣ ଲୋକମାଂ ମୋକ୍ଷ ସିଵାଯ ବୀଜୁଂ କୋଈ ପଣ (ବୀଜୀ କୋଈ ପଣ ଵସ୍ତୁ) ପରମସୁଖନୁଂ
କାରଣ ନଥୀ, ଏମ ନକ୍କୀ କରେ ଛେ : —
ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୮ ]ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ: [ ୨୧୩