Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration). Gatha-9 (Adhikar 2).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
१३५) तिहुयणि जीवहँ जत्थि णवि सोक्खहँ कारणु कोइ
मुक्सु मुएविणु एक्कु पर तेणवि चिंतहि सोइ ।।।।
त्रिभुवने जीवानां अस्ति नैव सुखस्य कारणं किमपि
मोक्षं मुक्त्वा एकं परं तेनैव चिन्तय तमेव ।।।।
तिहुयणि इत्यादि तिहुयणि त्रिभुवने जीवहं जीवानां जत्थि णवि अस्ति नैव किं
नास्ति सोक्खहं कारणु सुखस्य कारणम् कोइ किमपि वस्तु किं कृत्वा मुक्सु मुएविणु
एक्कु मोक्षं मुक्त्वेकं पर नियमेन तेणवि तेनैव कारणेन चिंतहि चिंतय सोइ तमेव मोक्षमिति
तथाहि त्रिभुवनेऽपि मोक्षं मुक्त्वा निरन्तरातिशयसुखकारणमन्यत्पञ्चेन्द्रियविषयानुभवरूपं
किमपि नास्ति तेन कारणेन हे प्रभाकरभट्ट वीतरागनिर्विकल्पपरमसामायिके स्थित्वा
गाथा
अन्वयार्थ :[त्रिभुवने ] तीन लोकमें [जीवानां ] जीवोंको [मोक्षं मुक्त्वा ] मोक्षके
सिवाय [किमपि ] कोई भी वस्तु [सुखस्य कारणं ] सुखका कारण [नैव ] नहीं [अस्ति ] है,
एक सुखका कारण मोक्ष ही है [तेन ] इस कारण तू [परं एकं तम् एव ] नियमसे एक
मोक्षका ही [विचिंतय ] चिंतवन कर जिसे कि महामुनि भी चिंतवन करते हैं
भावार्थ :श्रीयोगींद्राचार्य प्रभाकरभट्टसे कहते हैं कि वत्स; मोक्षके सिवाय अन्य
सुखका कारण नहीं है, और आत्मध्यानके सिवाय अन्य मोक्षका कारण नहीं है, इसलिये तू
वीतरागनिर्विकल्पसमाधिमें ठहरकर निज शुद्धात्म स्वभावको ही ध्या यह श्रीगुरुने आज्ञा की
तब प्रभाकरभट्टने बिनती की, हे भगवन्; तुमने निरंतर अतींद्रीय मोक्षसुखका वर्णन किया है,
सो ये जगतके प्राणी अतींद्रिय सुखको जानते ही नहीं हैं, इंद्रिय सुखको ही सुख मानते हैं
तब गुरुने कहा कि हे प्रभाकरभट्ट; कोई एक पुरुष जिसका चित्त व्याकुलता रहित है, पंचेन्द्रियके
ଭାଵାର୍ଥ:ଶ୍ରୀ ଯୋଗୀନ୍ଦ୍ରାଚାର୍ଯ ପ୍ରଭାକର ଭଟ୍ଟନେ କହେ ଛେ କେ ହେ ଶିଷ୍ଯ! ତ୍ରଣ ଲୋକମାଂ ପଣ
ମୋକ୍ଷ ସିଵାଯ ପଂଚେନ୍ଦ୍ରିଯନା ଵିଷଯନା ଅନୁଭଵରୂପ ବୀଜୁଂ କୋଈ ପଣ ନିରଂତର ଅତିଶଯ ସୁଖନୁଂ କାରଣ
ନଥୀ, ତେଥୀ ହେ ପ୍ରଭାକରଭଟ୍ଟ! ତୁଂ ଵୀତରାଗ ନିର୍ଵିକଲ୍ପ ପରମ ସାମାଯିକମାଂ ସ୍ଥିତ ଥଈନେ ନିଜ
ଶୁଦ୍ଧାତ୍ମସ୍ଵଭାଵନେ ଧ୍ଯାଵ.
ଅହୀଂ, ପ୍ରଭାକରଭଟ୍ଟ ପୂଛେ ଛେ କେ ହେ ଭଗଵାନ! ଆପ ଅତୀନ୍ଦ୍ରିଯ ମୋକ୍ଷସୁଖନୁଂ ନିରଂତର ଵର୍ଣନ
କରୋ ଛୋ, ପରଂତୁ ତେ ସୁଖନେ ଜଗତନା ଜୀଵୋ ଜାଣତା ନଥୀ. (ତୋ ତେ ସୁଖନୀ ଅନ୍ଯ ଜୀଵୋନେ ପ୍ରତୀତି
ଶୀ ରୀତେ ଥାଯ?)
୨୧୪ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୯