Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
व्यापाराभावेऽपि स्वात्मोत्थवीतराग परमानन्दसुखोपलब्धिरिति । अत्रेत्थंभूतं सुखमेवोपादेयमिति
भावार्थः । तथागमे चोक्त मात्मोत्थमतीन्द्रियसुखम् — ‘‘अइसयमादसमुत्थं विसयातीदं
अणोवममणंतं । अव्वुच्छिण्णं । च सुहं सुद्धुवओगप्पसिद्धाणं ।।’’ ।।९।।
मनके विकल्प – जालोंकी रुकावट होने पर विशेषतासे निर्व्याकुल सुख उपजता है । इसलिये
ये दो बातें प्रत्यक्ष ही दृष्टि पड़ती हैं । जो पुरुष निरोग और चिंता रहित हैं, उनके विषय – सामग्रीके
बिना ही सुख भासता है, और जो महामुनि शुद्धोपयोग अवस्थामें ध्यानारूढ़ हैं, उनके
निर्व्याकुलता प्रगट ही दिख रही है, वे इंद्रादिक देवोंसे भी अधिक सुखी हैं । इस कारण जब
संसार अवस्थामें ही सुखका मूल निर्व्याकुलता दीखती है, तो सिद्धोंके सुखकी बात ही क्या
है ? यद्यपि वे सिद्ध दृष्टिगोचर नहीं हैं, तो भी अनुमान कर ऐसा जाना जाता है, कि सिद्धोंके
भावकर्म, द्रव्यकर्म, नोकर्म नहीं, तथा विषयोंकी प्रवृत्ति नहीं है, कोई भी विकल्प – जाल नहीं
है, केवल अतींद्रिय आत्मीक – सुख ही है, वही सुख उपादेय है, अन्य सुख सब दुःस्वरूप
ही हैं । जो चारों गतियोंकी पर्यायें हैं, उनमें कदापि सुख नहीं है । सुख तो सिद्धोंके है, या
महामुनीश्वरोंके सुखका लेशमात्र देखा जाता है, दूसरेके जगतकी विषय – वासनाओंमें सुख नहीं
है ऐसा ही कथन श्रीप्रवचनसारमें किया है । ‘‘अइसय’’ इत्यादि । सारांश यह है, कि जो
शुद्धोपयोगकर प्रसिद्ध ऐसे श्रीसिद्धपरमेष्ठी हैं, उनके अतींद्रिय सुख है, वह सर्वोत्कृष्ट है, और
आत्मजनित है, तथा विषय – वासनासे रहित है, अनुपम है, जिसके समान सुख तीन लोकमें
भी नहीं है, जिसका पार नहीं ऐसा बाधारहित सुख सिद्धोंके है ।।९।।
ପଂଚେନ୍ଦ୍ରିଯଵିଷଯ ଅନେ ମନନା ଵିକଲ୍ପଜାଳନୋ ନିରୋଧ ଥତାଂ, ଵିଶେଷପଣେ ଆତ୍ମାଥୀ ଉତ୍ପନ୍ନ ସୁଖ ପ୍ରାପ୍ତ
ଥାଯ ଛେ. ଆ ସୁଖ ତୋ ସ୍ଵସଂଵେଦନପ୍ରତ୍ଯକ୍ଷଥୀ ଗମ୍ଯ ଛେ ଅନେ ସିଦ୍ଧୋନୁଂ ସୁଖ ତୋ ଅନୁମାନଥୀ ପଣ
ଜଣାଯ ଛେ. ତେ ଆ ପ୍ରମାଣେ : — ମୁକ୍ତ ଆତ୍ମାନେ ଶରୀର ଅନେ ଇନ୍ଦ୍ରିଯନା ଵିଷଯନା ଵ୍ଯାପାରନୋ
ଅଭାଵ ହୋଵା ଛତାଂ, ସୁଖ ଛେ ଏ ସାଧ୍ଯ ଛେ. ତେନୋ ହେତୁ ଏ ଛେ କେ ଅହୀଂ ଵୀତରାଗ ନିର୍ଵିକଲ୍ପ
ସମାଧିସ୍ଥ ପରମଯୋଗୀଓନେ, ପଂଚେନ୍ଦ୍ରିଵିଷଯ ଵ୍ଯାପାରନୋ ଅଭାଵ ହୋଵା ଛତାଂ ପଣ, ପୋତାନା ଆତ୍ମାଥୀ
ଉତ୍ପନ୍ନ ଵୀତରାଗ ପରମାନଂଦରୂପ ସୁଖନୀ ଉପଲବ୍ଧି ହୋଯ ଛେ.
ଅହୀଂ, ଆଵୁଂ ସୁଖ ଜ ଉପାଦେଯ ଛେ ଏଵୋ ଭାଵାର୍ଥ ଛେ. ଵଳୀ ଆଗମ (ଶ୍ରୀ ପ୍ରଵଚନସାର-୧-
୧୩)ମାଂ ଆତ୍ମାଥୀ ଉତ୍ପନ୍ନ ଅତୀନ୍ଦ୍ରିଯ ସୁଖନୁଂ ସ୍ଵରୂପ ପଣ କହ୍ଯୁଂ ଛେ କେ : —
‘‘अइसयमादसमुत्थं विषयातीदं अणोवममणंतं ।
अव्वुच्छिण्णं च सुहं सुद्धुवओगप्पसिद्धाणं ।।’’
(ଅର୍ଥ : — ଶୁଦ୍ଧୋପଯୋଗଥୀ ନିଷ୍ପନ୍ନ ଥଯେଲା ଆତ୍ମାଓନୁଂ (କେଵଳୀ ଭଗଵଂତୋନୁଂ ଅନେ ସିଦ୍ଧ
ଭଗଵଂତୋନୁଂ) ସୁଖ ଅତିଶଯ, ଆତ୍ମୋତ୍ପନ୍ନ, ଵିଷଯାତୀତ (ଅତୀନ୍ଦ୍ରିଯ), ଅନୁପମ (ଉପମା ଵିନାନୁଂ)
୨୧୬ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୯