Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration). Gatha-10 (Adhikar 2).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
अथ यस्मिन् मोक्षे पूर्वोक्त मतीन्द्रियसुखमस्ति तस्य मोक्षस्य स्वरूपं कथयति
१३६) जीवहँ सो पर मोक्खु मुणि जो परमप्पय-लाहु
कम्म-कलंक-विमुक्काहँ णाणिय बोल्लहिँ साहू ।।१०।।
जीवानां तं परं मोक्षं मन्यस्व यः परमात्मलाभः
कर्मकलङ्कविमुक्त ानां ज्ञानिनः ब्रुवन्ति साधवः ।।१०।।
जीवहं इत्यादि जीवहं जीवानां सो तं पर नियमेन मोक्खु मोक्षं मुणि मन्यस्व जानीहि
हे प्रभाकरभट्ट तं कम् जो परमप्पय-लाहु यः परमात्मलाभः इत्थंभूतो मोक्षः केषां भवति
कम्म-कलंक-विमुक्काहं ज्ञानावरणाद्यष्टविधकर्मकलङ्कविमुक्त ानाम् इत्थंभूतं मोक्षं के ब्रुवन्ति
णाणिय बोल्लहिं वीतरागस्वसंवेदनज्ञानिनो ब्रुवन्ति ते के साहू साधवः इति तथाहि
आगे जिस मोक्षमें ऐसा अतींद्रियसुख है, उस मोक्षका स्वरूप कहते हैं
गाथा१०
अन्वयार्थ :हे प्रभाकरभट्ट; जो [कर्मकलंकविमुक्तानां जीवानां ] कर्मरूपी
कलंकसे रहित जीवोंको [यः परमात्मलाभः ] जो परमात्मकी प्राप्ति है [तं परं ] उसीको
नियमसे तू [मोक्षं मन्यस्व ] मोक्ष जान, ऐसा [ज्ञानिनः साधवः ] ज्ञानवान् मुनिराज [ब्रुवंति ]
कहते हैं, रत्नत्रयके योगसे मोक्षका साधन करते हैं, इससे उनका नाम साधु है
भावार्थ :केवलज्ञानादि अनंतगुण प्रगटरूप जो कार्यसमयसार अर्थात् शुद्ध
परमात्माका लाभ वह मोक्ष है, यह मोक्ष भव्यजीवोंके ही होता है भव्य कैसे हैं कि पुत्र
कलत्रादि परवस्तुओंके ममत्वको आदि लेकर सब विकल्पोंसे रहित जो आत्मध्यान उससे
ଅନଂତ ଅନେ ଅଵିଚ୍ଛିନ୍ନ (ଅତୂଟକ ଛେ.) ୯.
ହଵେ, ଜେ ମୋକ୍ଷମାଂ ପୂର୍ଵୋକ୍ତ ଅତୀନ୍ଦ୍ରିଯ ସୁଖ ଛେ ତେ ମୋକ୍ଷନୁଂ ସ୍ଵରୂପ କହେ ଛେ :
ଭାଵାର୍ଥ:ପୁତ୍ର, କଲତ୍ରାଦି ପରଵସ୍ତୁଓନା ମମତ୍ଵଥୀ ମାଂଡୀନେ ସମସ୍ତ ଵିକଲ୍ପୋଥୀ ରହିତ
ଧ୍ଯାନଥୀ ଜେଓ ଭାଵକର୍ମ ଦ୍ରଵ୍ଯକର୍ମରୂପୀ କର୍ମକଲଂକଥୀ ରହିତ ଥଯା ଛେ ଏଵା ଭଵ୍ଯ ଜୀଵୋନେ କେଵଳଜ୍ଞାନାଦି
ଅନଂତଗୁଣନୀ ଵ୍ଯକ୍ତିରୂପ କାର୍ଯସମଯସାରଭୂତ ପରମାତ୍ମାନୀ ପ୍ରାପ୍ତି ତେ ଖରେଖର ମୋକ୍ଷ ଛେ, ଏମ
ସାଧୁଜ୍ଞାନୀଓ କହେ ଛେ.
୧ ପାଠାନ୍ତର :साधवः इति = रत्नत्रयवेष्टमेन
मोक्षसाधका = साधव इति ।
ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୧୦ ]ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ: [ ୨୧୭