Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
गाथामाह — ‘‘जं पुण सगयं तच्चं सवियप्पं होइ तह य अवियप्पं । सवियप्पं सासवयं णिरासवं
विगय संकप्पं ।’’ ।।१४।। एवं पूर्वोक्तै कोनविंशतिसूत्रप्रमितमहास्थलमध्ये निश्चय-
व्यवहारमोक्षमार्गप्रतिपादनरूपेण सूत्रत्रयं गतम् । इदानीं चतुर्दशसूत्रपर्यन्तं व्यवहारमोक्ष-
मार्गप्रथमावयवभूतव्यवहारसम्यक्त्वं मुख्यवृत्त्या प्रतिपादयति । तद्यथा —
१४१) दव्वइँ जाणइ जहठियइँ तह जगि मण्णइ जो जि ।
अप्पहँ केरउ भावडउ अविचलु दंसणु सो जि ।।१५।।
द्रव्याणि जानाति यथास्थितानि तथा जगति मन्यते य एव ।
आत्मनः सम्बन्धी भावः अविचलः दर्शनं स एव ।।१५।।
कथनमें यह गाथा कही है कि ‘‘जं पुण सगयं’’ इत्यादि । इसका सारांश यह है कि जो
आत्मतत्त्व है, वह भी सविकल्प-निर्विकल्पके भेदसे दो प्रकारका है, जो विकल्प सहित है,
वह तो आस्रव सहित है, और जो निर्विकल्प है, वह आस्रव रहित है ।।१४।।
इस तरह पहले महास्थलमें अनेक अंतस्थलोंमेंसे उन्नीस दोहोंके स्थलमें तीन दोहोंसे
निश्चय व्यवहार मोक्ष – मार्गका कथन किया ।
आगे चौदह दोहापर्यंत व्यवहारमोक्ष – मार्गका पहला अंग व्यवहारसम्यक्त्वको मुख्यतासे
कहते हैं —
गाथा – १५
अन्वयार्थ : — [य एव ] जो [द्रव्याणि ] द्रव्योंको [यथास्थितानि ] जैसा उनका
स्वरूप है, वैसा [जानाति ] जानें, [तथा ] और उसी तरह [जगति ] इस जगतमें [मन्यते ]
ଗାଥା (ଶ୍ରୀ ଦେଵସେନକୃତ ଶ୍ରୀ ତତ୍ତ୍ଵସାର ଗାଥା ୫)ମାଂ ପଣ କହ୍ଯୁଂ ଛେ କେ ‘‘जं पुण सगयं तच्वं सवियप्पं
होइ तह य अवियप्पं । सवियप्पं सासवयं णिरासवं विगय संकप्पं ।।’’ (ଅର୍ଥ: — ଵଳୀ ଜେ ଆତ୍ମତତ୍ତ୍ଵ
ଛେ ତେ ପଣ ସଵିକଲ୍ପ ଅନେ ନିର୍ଵିକଲ୍ପନା ଭେଦଥୀ ବେ ପ୍ରକାରନୁଂ ଛେ. ତେମାଂ ଜେ ସଵିକଲ୍ପ ଛେ ତେ ତୋ ଆସ୍ରଵ
ସହିତ ଛେ ଅନେ ଜେ ନିର୍ଵିକଲ୍ପ ଛେ ତେ ଆସ୍ରଵ ରହିତ ଛେ.) ୧୪.
ଏ ପ୍ରମାଣେ ପୂର୍ଵୋକ୍ତ ଓଗଣୀସ ସୂତ୍ରୋନା ମହାସ୍ଥଳମାଂ ନିଶ୍ଚଯଵ୍ଯଵହାର ମୋକ୍ଷମାର୍ଗନା
ପ୍ରତିପାଦନରୂପେ ତ୍ରଣ ସୂତ୍ରୋ ସମାପ୍ତ ଥଯାଂ.
ହଵେ, ଚୌଦ ସୂତ୍ରୋ ସୁଧୀ ଵ୍ଯଵହାରମୋକ୍ଷମାର୍ଗନା ପ୍ରଥମ ଅଂଗଭୂତ ଵ୍ଯଵହାରସମ୍ଯକ୍ତ୍ଵନୀ ମୁଖ୍ଯତାଥୀ
କଥନ କରେ ଛେ, ତେ ଆ ପ୍ରମାଣେ : —
୨୨୬ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୧୫