Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
दव्वइं इत्यादि दव्वइं द्रव्याणि जाणइ जानाति कथंभूतानि जहठियइं यथास्थितानि
वीतरागस्वसंवेदनलक्षणस्य निश्चयसम्यग्ज्ञानस्य परंपरया कारणभूतेन परमागमज्ञानेन
परिच्छिनत्तीति
न केवलं परिच्छिनत्ति तह तथैव जगि इह जगति मण्णइ मन्यते
निजात्मद्रव्यमेवोपादेयमिति रुचिरूपं यन्निश्चयसम्यक्त्वं तस्य परंपरया कारणभूतेन‘‘मूढत्रयं
मदाश्चाष्टौ तथानायतनानि षट् अष्टौ शङ्कादयश्चेति दृग्दोषाः पञ्चविंशतिः’’ इति
निर्दोष श्रद्धान करे, [स एव ] वही [आत्मनः संबंधी ] आत्माका [अविचलः भावः ]
चलमलिनावगाढ दोष रहित निश्चल भाव है, [स एव ] वही आत्मभाव [दर्शनं ] सम्यक्दर्शन
है
भावार्थ :यह जगत् छह द्रव्यमयी है, सो इन द्रव्योंको अच्छी तरह जानकर
श्रद्धान करे, जिसमें संदेह नहीं वह सम्यग्दर्शन है, यह सम्यग्दर्शन आत्माका निज स्वभाव
है
वीतरागनिर्विकल्प स्वसंवेदन निश्चयसम्यग्ज्ञान उसका परम्पराय कारण जो परमागमका
ज्ञान उसे अच्छी तरह जान, और मनमें मानें, यह निश्चय करे कि इन सब द्रव्योंमें निज
आत्मद्रव्य ही ध्यावने योग्य है, ऐसा रुचिरूप जो निश्चयसम्यक्त्व है, उसका परम्परायकारण
व्यवहारसम्यक्त्व देव-गुरु-धर्मकी श्रद्धा उसे स्वीकार करे
व्यवहारसम्यक्त्वके पच्चीस दोष
हैं, उनको छोड़े उन पच्चीसको ‘‘मूढ़त्रयं’’ इत्यादि श्लोकमें कहा है इसका अर्थ ऐसा
है कि जहाँ देव-कुदेवका विचार नहीं है, वह तो देवमूढ़, जहाँ सुगुरु-कुगुरुका विचार नहीं
ଭାଵାର୍ଥ:ଦ୍ରଵ୍ଯୋନେ ଜାଣେ ଛେଵୀତରାଗ ସ୍ଵସଂଵେଦନ ଜେନୁଂ ସ୍ଵରୂପ ଛେ ଏଵା ନିଶ୍ଚଯ
ସମ୍ଯଗ୍ଜ୍ଞାନନା ପରଂପରାଏ କାରଣଭୂତ ପରମାଗମନା ଜ୍ଞାନଥୀ ଆ ଜଗତମାଂ ଯଥାସ୍ଥିତ ଦ୍ରଵ୍ଯୋନୁଂ
ପରିଚ୍ଛେଦନ କରେ ଛେ, ମାତ୍ର ପରିଚ୍ଛେଦନ କରେ ଛେ ଏଟଲୁଂ ଜ ନହି ପଣ, ‘ନିଜଆତ୍ମଦ୍ରଵ୍ଯ ଜ
ଉପାଦେଯ ଛେ’ ଏଵୀ ରୁଚିରୂପ ଜେ ନିଶ୍ଚଯସମ୍ଯକ୍ତ୍ଵ ଛେ ତେନୀ ପରଂପରାଏ କାରଣଭୂତ ଏଵା
‘‘मूढत्रयं
मदाश्चाष्टौ तथानायतनानि षट् अष्टौ शङ्कादयश्चेति दृग्दोषा पंचविंशतिः’’ (ଶ୍ରୀ ସୋମଦେଵକୃତ
ଯଶସ୍ତିଲକ ପୃଷ୍ଠ ୧୨୪) (ଅର୍ଥ:ତ୍ରଣ ମୂଢତା, ଆଠ ମଦ, ଛ ଅନାଯତନ, ଆଠ ଶଂକାଦି
ଅଂଗୋଏ ପ୍ରମାଣେ ସମ୍ଯଗ୍ଦର୍ଶନନା ପଚ୍ଚୀଶ ଦୋଷ ଛେ.) ଏମ ଶ୍ଲୋକମାଂ କହ୍ଯା ପ୍ରମାଣେ ସମ୍ଯକ୍ତ୍ଵନା
୧. ତ୍ରଣ ମୂଢତାଦେଵମୂଢତା, ଗୁରୁମୂଢତା, ଧର୍ମମୂଢତା.
୨. ଆଠ ମଦଜାତିମଦ, କୁଳମଦ, ଧନମଦ, ତପମଦ, ରୂପମଦ, ବଳମଦ, ଵିଦ୍ଯାମଦ, ରାଜମଦ.
୩. ଛ ଅନାଯତନକୁଦେଵ, କୁଗୁରୁ ଅନେ କୁଧର୍ମନୀ ଅନେ ଏ ତ୍ରଣେନା ଆରାଧକୋନୀ ପ୍ରଶଂସା.
୪. ଆଠ ଅଂଗୋଶଂକା, କାଂକ୍ଷା, ଵିଚିକିତ୍ସା, ମୂଢତା, ପରଦୋଷ-କଥନ, ଅସ୍ଥିରକରଣ, ସାଧର୍ମୀଓ ପ୍ରତ୍ଯେ ପ୍ରେମ ନ
ରାଖଵୋ, ଅପ୍ରଭାଵନା.
ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୧୫ ]ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ: [ ୨୨୭