Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration).

< Previous Page   Next Page >


Page 228 of 565
PDF/HTML Page 242 of 579

background image
Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
श्लोककथितपञ्चविंशतिसम्यक्त्वमलत्यागेन श्रद्दधातीति एवं द्रव्याणि जानाति श्रद्दधाति
कोऽसौ अप्पहं केरउ भावडउ आत्मनः संबंधिभावः परिणामः किंविशिष्टो भावः अविचल
अविचलोऽपि चलमलिनागाढदोषरहितः दंसणु दर्शनं सम्यक्त्वं भवतीति क एव सो जि
एव पूर्वोक्त ो जीवभाव इति अयमत्र भावार्थः इदमेव सम्यक्त्वं चिन्तामणिरिदमेव कल्पवृक्ष
इदमेव कामधेनुरिति मत्वा भोगाकांक्षास्वरूपादिसमस्तविकल्पजालं वर्जनीयमिति तथा
चोक्त म्‘‘हस्ते चिन्तामणिर्यस्य गृहे यस्य सुरद्रुमः कामधेनुर्धने यस्य तस्य का प्रार्थना
परा ।।’’ ।।१५।।
है, वह गुरुमूढ़, जहाँ धर्म-कुधर्मका विचार नहीं है, वह धर्ममूढ़ ये तीन मूढ़ता; और
जातिमद, कुलमद, धनमद, रूपमद, तपमद, बलमद, विद्यामद, राजमद ये आठ मद
कुगुरु, कुदेव, कुधर्म, इनकी और इनके आराधकोंकी जो प्रशंसा वह छह अनायतन और
निःशंकितादि आठ अंगोंसे विपरीत शंका, कांक्षा, विचिकित्सा, मूढ़ता, परदोष
कथन,
अथिरकरण, साधर्मियोंसे स्नेह नहीं रखना, और जिनधर्मकी प्रभावना नहीं करना, ये शंकादि
आठ मल, इसप्रकार सम्यग्दर्शनके पच्चीस दोष हैं, इन दोषोंको छोड़कर तत्त्वोंकी श्रद्धा
करे, वह व्यवहारसम्यग्दर्शन कहा जाता है
जहाँ अस्थिर बुद्धि नहीं है, और परिणामोंकी
मलिनता नहीं, और शिथिलता नहीं, वह सम्यक्त्व है यह सम्यग्दर्शन ही कल्पवृक्ष,
कामधेनु चिंतामणि है, ऐसा जानकर भोगोंकी वाँछारूप जो विकल्प उनको छोड़कर
सम्यक्त्वका ग्रहण करना चाहिये
ऐसा कहा है ‘हस्ते’ इत्यादि जिसके हाथमें चिन्तामणि
है, धनमें कामधेनु है, और जिसके घरमें कल्पवृक्ष है, उसके अन्य क्या प्रार्थनाकी
आवश्यकता है ? कल्पवृक्ष, कामधेनु, चिंतामणि तो कहने मात्र हैं, सम्यक्त्व ही कल्पवृक्ष,
कामधेनु, चिंतामणि है, ऐसा जानना
।।१५।।
ପଚୀସ ମଲନା ତ୍ଯାଗ ଵଡେ ଦ୍ରଵ୍ଯୋନୀ ଶ୍ରଦ୍ଧା କରେ ଛେ. ଆ ରୀତେ ଦ୍ରଵ୍ଯୋନେ ଆତ୍ମାନୋ ଅଵିଚଳ
ଚଳ, ମଳ, ଅଗାଢ ଦୋଷ ରହିତ ପରିଣାମ
ପୂର୍ଵୋକ୍ତ ଜୀଵଭାଵଜାଣେ ଛେ, ଶ୍ରଦ୍ଧେ ଛେ ତେ
ସମ୍ଯକ୍ତ୍ଵ ଛେ.
ଅହୀଂ, ଆ ଭାଵାର୍ଥ ଛେ କେ ଆ ଜ ସମ୍ଯକ୍ତ୍ଵ ଚିଂତାମଣି ଛେ, ଆ ଜ କଲ୍ପଵୃକ୍ଷ ଛେ,
ଆ ଜ କାମଧେନୁ ଛେ ଏମ ଜାଣୀନେ ଭୋଗ, ଆକାଂକ୍ଷା ସ୍ଵରୂପଥୀ ମାଂଡୀନେ ସମସ୍ତ ଵିକଲ୍ପ ଜାଳନେ
ଛୋଡଵା ଯୋଗ୍ଯ ଛେ. କହ୍ଯୁଂ ପଣ ଛେ କେ
‘‘हस्ते चिंतामणिर्यस्य गृहे यस्य सुरद्रुमः कामधेनुर्धने यस्य
तस्य का प्रार्थना परा ।।’’ (ଅର୍ଥ:ଜେନା ହାଥମାଂ ଚିଂତାମଣିରତ୍ନ ଛେ, ଜେନେ ଘେର କଲ୍ପଵୃକ୍ଷ ଛେ,
ଜେନା ଧନମାଂ କାମଧେନୁ ଛେ ତେନେ ଅନ୍ଯ ପ୍ରାର୍ଥନା କରଵାନୀ ଶୀ ଜରୂର ଛେ?) ୧୫.
୨୨୮ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୧୫