Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration). Gatha-16 (Adhikar 2).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
अथ यै षड्द्रव्यैः सम्यक्त्वविषयभूतैस्त्रिभुवनं भृतं तिष्ठति तानीदृक् जानीहीत्यभिप्रायं
मनसि संप्रधार्य सूत्रमिदं कथयति
१४२) दव्वइँ जाणहि ताइँ छह तिहुयणु भरियउ जेहिँ
आइ-विणास-विवज्जियहिँ णाणिहि पभणियएहिँ ।।१६।।
द्रव्याणि जानीहि तानि षट् त्रिभुवनं भृतं यैः
आदिविनाशविवर्जितैः ज्ञानिभिः प्रभणितैः ।।१६।।
दव्वइं इत्यादि दव्वइं द्रव्याणि जाणहि त्वं हे प्रभाकरभट्ट ताइं तानि
परमागमप्रसिद्धानि कतिसंख्योपेतानि छह षडेव यैः द्रव्यैः किं कृतम् तिहुयणु भरियउ
त्रिभुवनं भृतम् जेहिं यैः कर्तृभूतैः पुनरपि किंविशिष्टैः आइ-विणास-विवज्जयहिं
द्रव्यार्थिकनयेनादिविनाशविवर्जितैः पुनरपि कथंभूतैः णाणिहि पभणियएहिं ज्ञानिभिः प्रभणितैः
कथितैश्चेति अयमत्राभिप्रायः एतैः षड्भिर्द्रव्यैर्निष्पन्नोऽयं लोको न चान्यः कोऽपि लोकस्य
हर्ता कर्ता रक्षको वास्तीति किं च यद्यपि षड्द्रव्याणि व्यवहारसम्यक्त्वविषयभूतानि भवन्ति
आगे सम्यक्त्वके कारण जो छह द्रव्य हैं, उनसे यह तीनलोक भरा हुआ है, उनको
यथार्थ जानो, ऐसा अभिप्राय मनमें रखकर यह गाथासूत्र कहते हैं
गाथा१६
अन्वयार्थ :हे प्रभाकरभट्ट, तू [तानि षड्द्रव्याणि ] उन छहों द्रव्योंको [जानीहि ]
जान, [यैः ] जिन द्रव्योंसे [त्रिभुवनं भृतं ] यह तीन लोक भर रहा है, वे छह द्रव्य [ज्ञानिभिः ]
ज्ञानियोंने [आदिविनाशविवर्जितैः ] आदि अंतकर रहित द्रव्यार्थिकनयसे [प्रभणितैः ] कहे हैं
भावार्थ :वह लोक छह द्रव्योंसे भरा है, अनादिनिधन है, इस लोकका आदि अंत
नहीं है, तथा इसका कर्ता, हर्ता व रक्षक कोई नहीं है यद्यपि ये छह द्रव्य व्यवहारसम्यक्त्वके
ହଵେ, ସମ୍ଯକ୍ତ୍ଵନା ଵିଷଯଭୂତ ଜେ ଛ ଦ୍ରଵ୍ଯୋ ତ୍ରଣ ଜଗତମାଂ ଭର୍ଯାଂ ପଡ୍ଯାଂ ଛେ ତେମନେ ଏଵା
ଜ (ଏଵା ଜ ସ୍ଵରୂପେ) ଜାଣୋ, ଏଵୋ ଅଭିପ୍ରାଯ ମନମାଂ ରାଖୀନେ ଆ ଗାଥା-ସୂତ୍ର କହେ ଛେ :
ଭାଵାର୍ଥ:ଆ ଲୋକ ଆ ଛ ଦ୍ରଵ୍ଯୋଥୀ ବନେଲୋ ଛେ, ପଣ ବୀଜୋ କୋଈ ଲୋକନୋ କର୍ତା, ହର୍ତା
କେ ରକ୍ଷକ ନଥୀ.
ଵଳୀ, ଵ୍ଯଵହାରସମ୍ଯକ୍ତ୍ଵନା ଵିଷଯଭୂତ ଛ ଦ୍ରଵ୍ଯୋ ଛେ ତୋପଣ ଶୁଦ୍ଧନିଶ୍ଚଯନଯଥୀ ଶୁଦ୍ଧାତ୍ମାନୀ
ଅନୁଭୂତିରୂପ ଵୀତରାଗ ସମ୍ଯକ୍ତ୍ଵନୋ ଵିଷଯ ତୋ ନିତ୍ଯାନଂଦ ଜେନୋ ଏକ ସ୍ଵଭାଵ ଛେ ଏଵୋ
ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୧୬ ]ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ: [ ୨୨୯