Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration). Gatha-19 (Adhikar 2).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
परमानन्दैकरूपसुखामृतरसास्वादेन समरसीभावपरिणतस्वरूपत्वात् परमानन्दस्वभावः णियमिं
शुद्धनिश्चयेन जोइय हे योगिन् अप्पु तमित्थंभूतमात्मानं मुणि मन्यस्व जानीहि त्वम् पुनरपि
किंविशिष्टं जानीहि णिच्चु शुद्धद्रव्यार्थिकनयेन टङ्कोत्कीर्णज्ञायकैकस्वभावत्वान्नित्यम् पुनरपि
किंविशिष्टम् णिरंजणु मिथ्यात्वरागादिरूपाञ्जनरहितत्वान्निरञ्जनम् पुनश्च कथंभूतमात्मानं
जानीहि भाउ भावं विशिष्टपदार्थम् इति अत्रैवंगुणविशिष्टः शुद्धात्मैवोपादेय अन्यद्धेयमिति
तात्पर्यार्थः ।।१८।।
अथ
१४५) पुग्गलु छव्वहु मुत्तु वढ इयर अमुत्तु वियाणि
धम्माधम्मु वि गयठियहँ कारणु पभणहिँ णाणि ।।१९।।
पुद्गलः षड्विधः मूर्तः वत्स इतराणि अमूर्तानि विजानीहि
धर्माधर्ममपि गतिस्थित्योः कारणं प्रभणन्ति ज्ञानिनः ।।१९।।
अतिन्द्रिय सुखस्वरूप अमृतके रसके स्वादसे समरसी भावको परिणत हुआ है, ऐसा हे योगी;
शुद्ध निश्चयसे अपनी आत्माको ऐसा समझ, शुद्ध द्रव्यार्थिकनयसे बिना टाँकीका घडया हुआ
सुघटघाट ज्ञायक स्वभाव नित्य है
तथा मिथ्यात्व रागादिरूप अंजनसे रहित निरंजन है ऐसी
आत्माको तू भलीभाँति जान, जो सब पदार्थोंमें उत्कृष्ट है इन गुणोंसे मंडित शुद्ध आत्मा
ही उपादेय है, और सब तजने योग्य हैं ।।१८।।
आगे फि र भी कहते हैं
गाथा१९
अन्वयार्थ :[वत्स ] हे वत्स, तू [पुद्गलः ] पुद्गलद्रव्य [षड्विधः ] छह प्रकार
ଅନେ ଵ୍ଯଵଧାନଥୀ ରହିତ ଲୋକାଲୋକ ପ୍ରକାଶକ କେଵଳଜ୍ଞାନଥୀ ରଚାଯେଲ ହୋଵାଥୀ ଜ୍ଞାନମଯ ଛେ,
ଵୀତରାଗପରମାନଂଦ ଜ ଜେନୁଂ ଏକ ରୂପ ଛେ ଏଵା ସୁଖାମୃତନା ରସାସ୍ଵାଦଥୀ ଜେନୁଂ ସ୍ଵରୂପ ସମରସୀଭାଵମାଂ
ପରିଣମ୍ଯୁଂ ହୋଵାଥୀ ପରମାନଂଦସ୍ଵଭାଵଵାଳୋ ଛେ. ଶୁଦ୍ଧଦ୍ରଵ୍ଯାର୍ଥିକନଯଥୀ ଏକ (କେଵଳ) ଟଂକୋତ୍କୀର୍ଣ
ଜ୍ଞାଯକସ୍ଵଭାଵଵାଳୋ ହୋଵାଥୀ ନିତ୍ଯ ଛେ, ମିଥ୍ଯାତ୍ଵ ରାଗାଦି ଅଂଜନ ରହିତ ହୋଵାଥୀ ନିରଂଜନ ଛେ ଅନେ
ଏକ ଵିଶିଷ୍ଟ ପଦାର୍ଥ ଛେ.
ଅହୀଂ ଆଵା ଗୁଣଵାଳୋ ଶୁଦ୍ଧ ଆତ୍ମା ଜ ଉପାଦେଯ ଛେ, ବାକୀନୁଂ ବଧୁଂଯ ହେଯ ଛେ ଏଵୋ ତାତ୍ପର୍ଯାର୍ଥ
ଛେ. ୧୮.
ହଵେ, ଫରୀ କହେ ଛେ :
୨୩୪ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୧୯